इंडिया गठबंधन के सभी घटक दल अपनी औकात अधिक दिखाने के चक्कर में अपने ही इंडिया गठबंधन का सत्यानाश कर देते हैं। आपको मैं मात्र तीन उदाहरण देना चाहूंगा, एक यूपी लोकसभा का पिछला चुनाव, जहां कांग्रेस ने सपा से तालमेल कर चुनाव लड़ा था। एक बार जब दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल हो गया, उसके बाद सपा नेतृत्व ने अपने साथ कांग्रेस की सीटों पर खुलकर खुले दिल और दिमाग से प्रचार किया था, जिसका नतीजा सामने है इंडिया गठबंधन भाजपा से आगे रहा, दूसरा और तीसरा उदाहरण महाराष्ट्र के लोकसभा और बिहार विधान सभा चुनाव का है।लालू यादव बिना कांग्रेस और अन्य घटक दल से बातचीत किए बिना जगह-जगह प्रत्याशियों का नाम घोषित किया ,फिर कांग्रेस की नाराजगी के बाद वापस लिए फिर बिना बात किए सभी घटक दलों के सीट बांट दिए, नतीजतन कांग्रेस की कई सीटों पर कांग्रेस और वामदल और राजद के प्रत्याशी आमने-सामने आ गए और राजद के इशारे पर किसी भी घटक दल ने नाम वापस नहीं लिया और फ्रैंडली फाइट नाम दिया गया, जब कि चुनाव मैदान में फ्रैंडली फाइट नाम की कोई चीज नहीं होती,यही हाल महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में रहा वहां शिवसेना(उद्धव ठाकरे)ने चुनाव पूर्व ही मुख्यमंत्री घोषित करने का कांग्रेस पर दबाव डाल घोषित करवाना और सीट शेयरिंग में भी अपनी मनमानी, यहां अब मैं बी.एम.सी. के चुनाव में राज ठाकरे और उद्धव के तालमेल होने से कांग्रेस ने अलग अकेले चुनाव लड़ने की बात कही है, दरअसल अब कांग्रेस की समझ में आ रहा है कि तालमेल में जनता की सहमति। यहां कांग्रेस का वोटर अल्पसंख्यक और यूपी, बिहार की जनता, थोड़े बहुत महाराष्ट्रियन, जब कि उद्धव और राज की शिवसेना और भाजपा का भी लगभग (अल्पसंख्यकों को छोड़कर)यही है, इसीलिए कांग्रेस की बेहतरी भी अकेले बी.एम.सी. चुनाव लड़ने में है, पिछले लगभग 25 सालों से बी. एम. सी.(मुम्बई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन का चुनाव) की सत्ता से बाहर है, शिवसेना और शरद पवार की पार्टी का तो अस्तित्व ही दांव पर लगा है। -सम्पादकीय -News51.in
जब भी इंडिया गठबंधन के घटक दल आपस में ही सीट शेयरिंग को लेकर बेईमानी पर उतरी, तब-तब इंडिया गठबंधन का सत्यानाश हुआ?
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