Friday, February 13, 2026
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पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, इसकी वजह जानना जरूरी!

कांग्रेस नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए नई दिल्ली में एक बैठक पिछले दिनों बुलाई थी, जिसमें पश्चिम बंगाल प्रभारी प्रदेश अध्यक्ष सहित तमाम नेताओं को बुलाया था, जिसमें सभी की राय ली गई। एक बात सभी की एक सुर में आई कि वामदलों के साथ तालमेल का बुरा असर केरला विधान सभा चुनाव पर गलत पड़ सकता है।इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी से इतर अन्य किसी छोटी-बड़ी पार्टी से तालमेल न किया जाए और विधान सभा चुनाव पर सभी 294 सीटों पर अपनी पार्टी का उम्मीद वार उतारा जाए। यहां यह बताना जरूरी है कि पिछले 2021 के चुनाव में कांग्रेस वामदल के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी और कांग्रेस और वाममोर्चा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और कांग्रेस का वोट मात्र 3% पूरे प्रदेश में रह गया था जब कि 2021 के पहले वाले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को 44 और वाममोर्चे को 26 सीट मिली थी, जब। वाममोर्चे की सरकार बंगाल में थी तब भी कांग्रेस की0 सीट कभी नहीं आई थी। जब से पश्चिम बंगाल में भाजपा ने जोर लगाया है तब से वहां की लड़ाई ममता की टी.एम.सी. और भाजपा के इर्द-गिर्द हो गई है2021 में टी.एम.सी. का 3% वोट बढा और उसकी 4 सीट बढ गई, वहीं भाजपा का26%वोट बढ गया और उसकी सीटें बढ़कर 74 हो गई। 2006 में जब वाममोरचे की सरकार थी तब कांग्रेस ने अकेले 21 सीट जीती थी । 2011 में कांग्रेस ने टी.एम.सी. से तालमेल कर चुनाव लड़ा था तब कांग्रेस ने 41 सीट जीती और टी.एम.सी. ने वाममोर्चे का सफाया कर अपनी सरकार बनाई। 2016 के चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट से गठबंधन किया और दोनों ने मिलकर 77 सीटें जीती, अकेले कांग्रेस ने 44 सीटें जीती थी ।इस बार ममता बनर्जी ने पहले ही कांग्रेस से तालमेल न करने का एलान कर दिया। अब राहुल के लिए यह सुनहरा अवसर यह हुआ कि कांग्रेस पर इंडिया गठबंधन तोड़ने का आरोप नहीं लग सकता,दूसरे वाममोर्चा से दूरी बनाकर केरल को भी यह संदेश दिया कि उसका पश्चिम बंगाल में वामदल से गठबंधन है और केरल में अलग लड़ रहे हैं अब ममता बनर्जी की टी.एम.सी.,भाजपा, कांग्रेस वामदल, ओवैसी की पार्टी सहित अन्य छोटे-बड़े दल मैदान में हैं और, 2026 में ही7-8 महीने बाद विधान सभा चुनाव होना है।ममता बनर्जी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं टी.एम.सी. से अलग हुए हुमायूं कबीर के सहारे ओबैसी मुस्लिमों को लुभाने की फिराक में हैं, दूसरी तरफ टी.एम.सी. छोड़कर कांग्रेस में आई मौसम नूर(15अक्टूबर1979) मुस्लिमों में बड़ा चेहरा हैं,राज्य सभा सांसद हैं पूर्व में मालदा जिले की अध्यक्ष और टी.एम.सी. की2009से 2019 तक लोकसभा सांसद रह चुकी हैं कोलकोता विश्व विद्यालय से एल.एल.बी. की पढाई किया है चार बार विधायक और 8 बार सांसद रहीं अब्दुल गनी खान चौधरी जैसे प्रभावशाली मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती हैं, उनकी मां रूबी खान (1945-2008) तक कांग्रेस की विधायक थीं प्रदेश प्रभारी गुलाम अहमद मीर और प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार सहित अधीर रंजन सहित सभी नेता मीटिंग में शामिल रहे और सभी ने पूरे प्रदेश की 294 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात पर खुशी जाहिर की।टी.एम.सी. और भाजपा में घमासान मचा हुआ है और ममता बनर्जी सालों से सत्ता में हैं।इधर कांग्रेस नेतृत्व की सभी सीटों पर लड़ने की बात से थक-हार कर घर बैठे पुराने कांग्रेसियों में खुशी की लहर आ गई है, एक समय पश्चिम बंगाल कांग्रेस का गढ रहा था, कहने को तो 2021 में चुनाव के दरम्यान मात्र एक रैली आधे-अधूरे मन से की थी तब राहुल गांधी को यह समझाया गया था कि अगर कांग्रेस कायदे से जमकर चुनाव लडती है, तो इसका फायदा भाजपा को हो सकता है, लेकिन इस बार राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की समझ में यह समझ आगया कि ममता बनर्जी अंदर से कांग्रेस को पूरे भारत से ही केजरीवाल की तर्ज पर समाप्त करना चाहती है इस लिए अब अपने पुराने गढ को जीतना ही होगा और ममता बनर्जी को समाप्त करना आवश्यक है, भले ही यह एक बार में न हो, यह तो तय है कि इस बार की लड़ाई भाजपा और ममता बनर्जी के बीच ही होगा, लेकिन यह भी तय है कि कांग्रेस तिसरा मज़बूत विकल्प बनने का भरपूर प्रयास करेगा, सीटों की तो नहीं,लेकिन कांग्रेस नेतृत्व का प्रयास होगा कि वोटों को3% से बढाकर लगभग 10% के आसपास लाया जा सके,ताकि 2029 की लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एक मज़बूत विकल्प बन कर उभरे।इसके लिए। कांग्रेस मौसम नूर को या अधीर रंजन को मुख्य मंत्री पद का चेहरा भी बना भी बना सकती है हालांकि कांग्रेस किसी को भी मुख्य मंत्री का चेहरा नहीं बनाती। सम्पादकीय-News51.in

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