Sunday, May 26, 2024
होमइतिहासमहान स्वतंत्रता सेनानी -चंद्र शेखर आजाद उर्फ पंडित जी

महान स्वतंत्रता सेनानी -चंद्र शेखर आजाद उर्फ पंडित जी

चंद्र शेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जनपद के भाबरा गांव में वर्तमान में चंद्र शेखर आजाद नगर में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। पिता पं. सीता राम तिवारी और माता जगदानी देवी थीं। पिता बेहद इमानदार और बहादुर थे चंद्र शेखर भी अपने पिता की तरह थे। 14 वर्ष की उम्र में बनारस में संस्कृति पाठशाला में संस्कृति की पढाई की। वहीं सरकार के खिलाफ कानून भंग आंदोलन में शामिल हुए। 1920-21 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में पकड़े गए। अदालत में जज को अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और निवास जेल बताया। जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई। हर कोड़े पर वंदे मातरम और महात्मा गांधी की जय का उदघोष किया। सजा के बाद जनता ने उन्हें फूल माला से लाद दिया। उसी समय से वह सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। गांधी जी के बीच में असहयोग आंदोलन रोक देने से आजाद ने उन्होंने क्रांति का रास्ता अपना लिया और मित्र क्रांतिकारी रामप्रसाद विस्मिल के साथ काकोरी में ट्रेन में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया पुलिस बुरी तरह से काकोरी काण्ड के आरोपीयों के पीछे पड़ गई थी तो आजाद विंध्य के जंगलों और पहाड़ों के रास्ते कानपुर जा पहुंचे।वो क्रान्तिकारीयों में पण्डित जी के नाम से प्रसिद्ध थे। 17 दिसम्बर 1928 को लाठियों से पीटवा कर लाला लाजपत राय के हत्यारे सांडर्स को कोतवाली के सामने आजाद, भगत सिंह और राजगुरू ने तब घेर लिया जब सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटरसाइकिल से निकल रहा था। पहली गोली राजगुरू ने मारी थी। तब भगत सिंह ने पास जाकर 4 गोली और मारी। इतमीनान होने पर कि सांडर्स मर गया तब सब लोग भागे। जब अंगरक्षक ने पीछा किया तो उसे चंद्र शेखर आजाद ने गोली मार दी। दूसरे दिन पूरे लाहौर में पर्चे बंटे कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया गया। पूरे भारत में तब सनसनी मची थी। चंद्र शेखर आजाद ने अपनी फरारी का अधिकांश समय, लगभग 10।वर्ष झांसी में मास्टर रूद्र नरायन सक्सेना के यहां गुजारे थे। सक्सेना जी बहुत अच्छे पेंटर भी थे वहीं उन्होंने आजाद को घंटे भर खड़ा कर मूछों पर ताव देते पेंटिंग भी बनाई थी। 1931 में उन्होंने रूस की बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आह्वान किया और संकल्प लिया था न कभी पकड़े जाएंगे, न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे पायेगी। 27 फरवरी 1931 को अलफ्रेड पार्क में बैठे कुछ साथियों का इंतजार कर रहे थे उनके एक दोस्त से कुछ विवाद हुआ तो उसने पुलिस को आजाद के पार्क में होने की सूचना दे दिया। पुलिस ने पार्क को घेर लिया। आजाद समझ गए थे कि बचना मुश्किल है उन्होंने लगभग 15 पुलिस वालों को गोलियां मारी। लेकिन जब एक गोली बची तो उन्होंने अपने को गोली मारकर जिंदगी भर पुलिस के हाथ जिंदा न पकड़े जाने की प्रतिझा निभाई। इस प्रकार एक महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांति वीर ने अपने को देश पर न्योछावर कर दिया।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments