Saturday, July 13, 2024
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भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में मुस्लिम सेनानियों की उल्लेखनीय भूमिका

भारत के उपनिवेशवाद विरोधी और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में मुस्लिम सेनानियों की उल्लेखनीय भूमिका —- भाग एक

समाज को बाटने वाले कुछ सगठन , साम्प्रदायिक नेता और दक्षिण पंथी हिंदूवादी कुछ लोग , मुस्लिमो को ”गद्दार ‘ और विदेशी के रूप में प्रचारित करके उन्हें कंलकित और अलग – थलग करने के लिए सक्रिय रूप से जुटे हुए है , लेकिन भारत की साम्राज्यवाद – विरोधी गौरव गाथा इस बात को पर्याप्त रूप से सिद्ध करती है कि किस प्रकार से हिन्दू और मुसलमान दोनों ही भारत से ब्रिटिश राज को खत्म करने के लिए दिलेरी से लड़े थे |
हिन्दू – मुस्लिम ब्रांड वाली साम्प्रदायिक राजनीति के झंडाबरदारो को , जिन्होंने मौजूदा समय के बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद के जरिये दोनों धार्मिक समुदायों के बीच हिंसा और अविश्वास को जन्म दिया है , यह याद दिलाये जाने की जरूरत है कि 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान ” यह वही अयोध्या थी जहाँ पर मौलवी और महंत तथा आम हिन्दू और मुस्लिम ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत करते हुए एकजुट हुए और उन्होंने फाँसी के फंदे को गले लगाया | मौलाना अमीर अली अयोध्या के मशहूर मौलवी थे और जब अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमान गढी , हनुमान मंदिर के पुजारी बाबा रामचरण दास ने अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ शस्त्र प्रतिरोध की अगुवाई की तो मौलाना इंकलाबी सेना में शामिल हो गये | अग्रेजो और उनके पिट्ठुओ के साथ लड़ाई में दोनों पकडे गये और उन्हें अयोध्या में कुबेर टीला पर एक साथ इमली के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया |””
फैजाबाद जिले में राजा देविबक्श सिंह की सेना की अगुवाई करने वाली इसी इलाके के ही अच्छन खान और शम्भु प्रसाद शुक्ला ने बहुत सी लड़ाइयो में अग्रेजी सेना को परास्त किया | लेकिन जब पकडे गये तो हिन्दुओ और मुस्लिमो के बीच इस प्रकार के भाईचारे को ह्त्तोस्साहित करने के लिए इन दोनों ही मित्रो को लम्बे समय तक सरेआम यातनाये दी गयी और उनके सिरों को क्रूरतापूर्वक धड से अलग कर दिया गया | यहाँ , यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर को 11 मई 1857 को भारत का शासक घोषित करने वाली इंकलाबी सेना में 70% से अधिक हिन्दू सैनिक थे | स्वाधीनता के ”राष्ट्रीय युद्ध ” का नेतृत्व नाना साहेब , बहादुरशाह जफर , मौलवी अहमद शाह . तात्या टोपे , खान बहादुर खान , रानी लक्ष्मी बाई , हजरत महल , अजीमुल्ला खान और फिरोजशाह जैसे नेताओं ने सयुक्त रूप से किया था | ये प्रसिद्ध क्रांतिकारी विभिन्न धर्मो से ताल्लुक रखते थे |
इसके अलवा , 22 सितम्बर को मेजर हडसन ने बहादुर शाह जफर के बेटो और पोते मिर्जा मुग़ल , मिर्जा खिज्र और मिर्जा अबू बक्र की ऐतिहासिक खुनी दरवाजा के गेट पर हत्या कर दी गयी | शहजादे विद्रोहियों के साथ मिलकर जोरदार तरीके से लडे , लेकिन उनके उपर काबू पा लिया गया | 1857 के विद्रोह के दौरान खूनी दरवाजा मेहराबदार रास्ता न था न कि पारम्परिक अर्थ दरवाजा | अभिलेखागार कैसर – उल – तवारीख के वार्षिक वृत्तांत में इस बात का उल्लेख्य है कि भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857-58 के दौरान केवल दिल्ली में फांसी पर चढाये गये मुस्लिमो की सख्या 27 हजार थी , आम नरसंहार में मरे गये लोगो की संख्या इसमें शामिल नही है | मकबूल शायर मिर्जा ग़ालिब 1797 -1869 ने अपने पत्रों में इस प्रकार के नरसहारों का सजीव विवरण प्रस्तुत किया है | इसी प्रकार , बंगाल में हिन्दू मुस्लिम एकता के उद्देश्य को ध्यान में रखकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब की स्मृति को सम्मान देने के लिए 3 जुलाई 1940 को सिराज – उद – दौला दिवस मनाने का आव्हान किया था | सिराज – उद – दौला ने ही सबसे पहले भारत की धरती पर उपनिवेशवादी ब्रिटिश एजेंटो को चुनौती दी थी | लेकिन अपने वोट बैंक के खातिर खासकर दक्षिण पंथी हिंदूवादी नेताजी के सैन्य नायकत्व की तो सराहना करते है पर हिन्दू – मुस्लिम एकता और धार्मिक अल्पसंख्यको के अधिकारों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता की अनदेखी करते है | शहीदों को इस तरह से राजनितिक रूप से हथिया लेना ओछी और खतरनाक प्रवृत्ति है | हम करतार सिंह सराभा , अशफाक उल्ला खान और सुभाष चन्द्र बोस को धार्मिक आधार पर नही बाट सकते | उनके भविष्य – स्वप्न और विचारों को ठोस रूप में प्रस्तुत करने के लिए इन शहीदों को घिसी – पिटी छवियो से मुक्त करना जरूरी है | उपलब्ध अभिलेख इस बात को साबित करते है कि अंग्रजी हुकूमत के खिलाफ मुस्लिम प्रतिरोध की पहचान टीपू सुलतान नवम्बर 1750, देवनाहल्ली – 4 मई 1799 श्रीरंगपटनम के ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष के समय से की जा सकती है | यह टीपू ही था जिसने भारतीय शासको को झकझोरा और अंग्रेजो के खिलाफ संयुकत मोर्चा बनाने का आव्हान किया | इसके बाद 19वी सदी के प्रथामार्ध में अशरफ अहमद बरेलवी ने इस कड़ी को आगे बढ़ाया | उनका वहाबी आन्दोलन देश के कोने – कोने तक पहुच गया | यह विदेशी शासको को उखाड़ फेंकने के लिए सभी मुस्लिमो और हिन्दुओ को एक साथ आने की उनकी अपील का ही कमाल था कि बड़ी संख्या में स्नातको ने ब्रिटिश आकाओं की से1831 में उन्हें बालाकोट में मार डाला गया | ऐसे बहुत से दुसरे मुस्लिम नायक है जिन्होंने अपने गैर मुस्लिम साथियों के साथ गोलिया खाकर अपने जीवन की आहुति दी , फांसी पर क्लात्काए गये या उन्हें उम्र कैद मिली और वे अंडमान द्दिप की जेल में अकेले और उपेक्षित मरने के लिए भेज दिए गये | देश की आजादी के लिए भारत के मुस्लिमो की ऐसी गौरवशाली कुर्बानियों की शिनाख्त अतीत के सन्यासियों और फकीरों के विद्रोह 1763 – 1800 और उपनिवेशवाद विरोधी उल्लेखनीय वहाबी आन्दोलन 1820 – 1870 के समय से भी की जा सकती है | उस समय आक्रामक राष्ट्रवाद के आगमन के साथ हिन्दू और मुस्लिम संयुकत रूप से विभिन्न क्रांतिकारी समितियों में सगठित हुए और जिनमे उन्होंने हिस्सा लिया उनके नाम है — तमिलनाडू की मित्र मेला महाराष्ट्र की अभिनव भारत , बंगाल की आत्मोन्नति , अनुशीलन सुहृदय ,साधना , ब्रतीब, संदेश , बाँधव समितियाँ और पंजाब की भारत माता समिति इसी तरह स्वाधीनता आन्दोलन के बहुत से महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को उलेमाओं इस्लाम तथा इस्लामिक कानून में प्रशिक्षित मुस्लिम विद्वान् का उनके ‘फतवों ‘ के जरिये समर्थन प्राप्त था ; यह भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मुस्लिमो की बहु आयामी भूमिका का अहम् हिस्सा था | यह अपनी बेमिसाल कुर्बानियों को दर्शाता है | जाहिर है कि समूचे भारत में मुस्लिमो ने अन्य भारतीयों के साथ प्रतिबद्ध स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में सहयोग किया | स्वाधीनता आन्दोलन में हिन्दुओ और मुस्लिमो के साझे प्रयासों की सराहना करते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने ठीक ही कहा था , ”यूरोप के आक्रमण के विरुद्ध एक एशियाई के रूप में हम एकता के साझे बंधन को महसूस करते है | ”इस सबके बावजूद मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका को उस तरह से चिन्हित नही किया गया जैसा की उसे किया जाना चाहिए था | बड़े हैरत की बात है कि मौजूदा पीढ़ी , मुख्यत: उग्र हिन्दू , दुखद रूप से पूरी तरह पूर्वाग्रह ग्रस्त है और सोचते है कि यह केवल हिन्दू ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में संघर्ष करके स्वाधीनता हासिल की | वे बस गिनती के कुछेक मुस्लिमो , अली बंधू खान अब्दुल्ला गफ्फार खा ,शेख अब्दुल्ला , मौलना अबुल कलाम आजाद और डा जाकिर हुसैन के योगदान को ही इसमें शामिल करते है |

प्रस्तुती – सुनील दत्ता – स्वतंत्र पत्रकार – समीक्षक

पुस्तक — स्वाधीनता संग्राम में मुस्लिम भागीदारी – डा पृथ्वी राज कालिया

अनुवाद — कामता प्रसाद

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