Saturday, July 13, 2024
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बनारसी गुरूओं की महत्ता और उनकी शान

जिया राजा बनारस

गुरुओं की महत्ता

कौन गुरु कितना महान है , इसकी साधारण जानकारी आप सिर्फ दो बातो से कर सकते है | भोजन और भांग | जो गुरु जितना डटकर भोजन करता है , उसी अनुपात में वह भांग छानता है | भोजन के लिए चौचक प्रबंध भले ही ना हो पर भांग के लिए जरुर चाहिए | फिर जब गुरु भांग छान लेते है तब इस तरह भोजन करने लगते है , मानो अब एक हफ्ते तक उन्हें भोजन नही करना है | साधारांत: गुरु लोग सफेद धोती , एक चद्दर और एक लाल गमछा कंधे पर डाले बनारस की गलियों में चलते – फिरते दिखाई देते है | मस्तक पर चन्दन का तिलक , गले में लहराता हुआ यज्ञोपवित , हाथ में पूजन सामग्री अथवा पोथी – पत्रा लिए रहते है | कुछ गुरु लोग ‘ सेंगरी ‘ ( तेल पीकर लाल बनी लाठी ) लेकर भी चलते है | इनकी चाल में जितनी मजबूती रहती है , उतनी ही मस्ती भी | चप्पल या बुत पहनना वे पसंद नही करते | कपड़ेवाला जुटा या चमरौधा जिसमे नाल जड़े
हो — वे अधिक पसंद करते है | विशाल काया , जिसे देखते ही बच्चे सहम जाते है , मटके की भांति तोंद , जो न जाने कितना आसव अरिष्ट और पकवान खाकर फूलती है , भव्य मुख पर छोटी — घनी मूंछे और विजया के मद में डूबी लाल आँखे देखते ही लोगो का माथा श्रद्धा से झुक जाता है , जैसे आती हुई गाडी को देखकर सिग्नल झुक जाता है | जाडा हो या बरसात , पर गुरु लोग कोट – पतलून पहनना पसंद नही करते | नगे बदन रहना , थोड़े में संतुष्ट हो जाना उनकी सबसे बड़ी विशेषता है | याद रखिये यह युग प्रचार का है | विज्ञापन के जरिये आज बहुत — सी वस्तुओं का उपयोग कैसे किया जाता है – हमने सिखा है | ठीक उसी प्रकार पोशाक — आकृति या टीम — टाम से आप बनारसी गुरुओं को पहचानने में
गलती न कर बैठे | जिस ब्राह्मण को आप कोरा ब्राह्मण समझ रहे हो , मुमकिन है की वह कई विषयों का आचार्य हो |इसके विरुद्ध तेजस्वी लगने वाले ब्राह्मण अंगूठा लगाकर हस्ताक्षर करते हो | यद्दपि ये दोनों प्रकृति वाले यहा गुरु माने जाते है और दोनों ही पूज्य है , लेकिन यजमानो में श्रद्धा अलग — अलग किस्म से उत्पन्न होती है | जो गुरु जितना महान होगा वह उतना ही ‘ अजगर प्रवृति ‘ का होगा | ऐसे गुरु अपनी सारी प्रतिभा अपने साथ लिए चले जाते है | इन्हें न तो मौक़ा दिया जाता है और न लोग इनकी विद्वता ही जान पाते है | नतीजा यह होता है की उचित सम्मान न पाने के कारण वे स्वाभिमानी बन जाते है धीरे — धीरे यह स्वाभिमान हठका रूप धारण कर लेता है | इसके विरुद्ध रंग गांठने वाले या महापंडित लगनेवाले पंडित समाज में आदरणीय बने रहते है | सच पूछिये तो ऐसे गुरु सिर्फ कमाने — खाने वाले होते है | इनकी महत्ता विशेष नही होती है | लेकिन विद्वान् गुरुओं से कही अधिक इनका रंग रहता है |
विद्वान् पंडित कभी रंग गांठने का प्रयत्न नही करता | वह बहुत ही भोला — भाला सीधा — सादा प्रकृति का होतो है। लेखक- सुनीलकुमार दत्ता स्वतंत्र पत्रकार

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