Monday, March 4, 2024
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चम्बल के डकैत, जिनका अपनी बिरादरी में गहरी पकड़ थी और उनकी गिरफ्तारी पर लाखों के इनाम भी थे लेकिन राजनीति में चमक नहीं सके,कारण जानते हैं ?

19 वीं सदी में 1900 से लेकर 1990 तक के दशक में चम्बल की घाटी में एक से एक खूंखार डकैत पैदा हुए जिन्हे गिरफ्तार करने या मारने में पुलिस को सालों साल लग गये ।समय के साथ इन्होने भी अपने पास आधुनिक हथियार से घाटी को धर्राया ।लेकिन बाद में इनके बुरे शौक ( सुरा, सुंदरी और मोबाइल के प्रयोग ने) से अपनी और अपने दल को मुसीबत में डाला और आज इक्का- दुक्का छोटे मोटे डकैत ही बचे रह गये हैं बदलते आधुनिक दौर में और पुलिस के अत्याथुनिक हथियारों और सूचनातंत्र से और इनके गलत आचरण से इनके और गिरोह को पकड़ने या मारे जाने के चांसेज।भी बढ गये हैं ।पहले के डकैत अपने को बागी कहलाना पसंद करते थे। अधिकतर तब के डकैत पुलिस की प्रताड़ना, पट्टीदारों का झगडा़ जमीन जायदाद के झगडो़ं और गांव के धनाढ्य पुलिस को पैसे खिलाकर उनसे प्रताडित करा कर चोरी डकैती में फंसा देते थे इन से आजिज आकर ही लोग बदला लेने की नियत से चम्बल घाटी की शरण में जाकर किसी गिरोह मेंशामिल हो जाते थे और अपना बदला लेने की कोशिश करने लगते थे।पहले के डकैत अपने दल में महिलाओं का प्रवेश नहीं करते थे।बाद में विनोवा भावे, जय प्रकाश नरायण के प्रयासों से क ई डकैतों ने शर्तों के साथ आत्म समर्पण किया और।जेल की सजाकाट कर अपने परिवार के साथ गृहस्थ जीवन जी रहे हैं 27 अक्टूबर 1984 को मध्य प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कहने पर भारी संख्या में डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया और 10 साल की सजा काट न ई जिंदगी जी रहे हैं सुब्बाराव ने चंम्बल के 672 डाकुओं का आत्म समर्पण कराया था बडे़ इनाम राशि वाले डकैत रहे डाकुओं के सरगना मान सिंह, मोहर सिंह , मलखान सिंह, जगजीवन परिहार , राम बाबू गडे़रिया, पान सिंह तोमर ,रूपा पंडित, पंचम सिंह चौहान, माधो सिंह ,तहसीलदार सिंह , गब्बर सिंह, छविराम यादव उर्फ नेताजी, फूलन देवी , सुल्ताना और पुतली बाई जो नरतकी से पुलिस से बार- बार तंग किए जाने पर डाकू बनी । मध्य प्रदेश के पांच डकैतों ने चुनावों को प्रभावित किया जिनमें प्रेम सिंह , फूलन देवी , मनोहर सिंह गुर्जर, मलखान सिंह और ददुआ प्रमुख थे । 70 के दशक में मलखान सिंह की तूती बोलती थी उन्होने चम्बल पर पंद्रह साल तक राज्य किया उनपर कुल मिलाकर दो लाख रूपये का इनाम था1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के कहने पर आत्मसमर्पण किया और आज गृहस्थ जिंदगी जी रहे हैं ,मोहर सिंह पर 2 लाख का इनाम था और उनके गैंग पर 12 लाख का इनाम था 1960 दशक में चम्बल में उनका ही साम्राज्य था 1972 में 14 अप्रैल को उसने महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने मुरैना में आत्मसमर्पण कर दिया।राजनीति में भी गये।बहुत सफलता नहीं मिली ।सेना में कम्पाउंडर रहा माधो सिंह 1960 से 1972 तक चम्बल में अपना दबदबा बनाए था उसकी मोहर सिंह से गहरी दोस्ती थी।गांव लौटकर कम्पाउडरी करने लगा ।गांव के कुछ लोग उससे चिढते थे और उसे चोरी में फंसा दिया तब उसने बीहड़ की शरण ली और मोहर सिंह के साथ रहने।लगा फिर गांव में चोरी में फंसाने वाले दो लोगों को गांव आकर गोली मार दी फिर अपना गैंग चलाने लगा। 1971 में पुलिस मुठभेंड़ में उसके 13 साथी मारे थे तब उसने लोक नायक जय प्रकाश नरायण से मिलकर आत्मसमर्पण कर दिया । मोहर सिंह, माधो सिंह और मलखान के पास उस समय के अत्याधुनिक हथियार एस एल आर और सेमी आटो मेटिक गन ,303 बोर राईफल ,एल एमज और स्टेनगन आदि जैसे हथियार थे माधो सिंह , फूलन देवी ,मोहर सिंह ने राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन फूलन केअलावा राजनीति में कोई नहीं चला।मान सिंह के पास काफी जमीन जायदाद थी गांव ही नहीं आसपास के सम्मानितों मे उनके घर का नाम था लेकिन गांव में कुंआ से पानी लेने केविवाद में गोलियां चली और उन्हे उनके पुत्र तहसीलदार सिंह और उनके पारिवारिक पुरोहित रूपा पंडित को जेल जाना फिरभी पुलिस से परेशान होकर तीनों चम्बल में कूद गये ।1939 से 1955 तक चम्बल में शेरों की तरह रहे और उनका चम्बल में बहुत मान सम्मान।रहा।गरीब लड़कियों।की शादी कराने से लेकर।भात पहनाने तक का कार्य करते थे महिलाओं की बहुत इज्जत करते थे। वे यूपी के थे लेकिन।उनका इनकाउंटर भिंड के लावन गांव में हुआ था ।उधके गांव में लोग मंदिर बनाकर उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं बाद मे रूपा पंडित का भी इनकाउंटर हो गया था।मानसिंह के परिवार के क ई लोग पुलिस में बडे़ अधिकारी(आईजी और डीएसपी तक) हुए ।यूपी के खेडा़ राठौर केरहने वाले मानसिंह के नाम मंदिर बनाकर उनके चाहने वालों उनकी और।उनकी पत्नी।गायत्री देवी की प्रतिमा भी स्थापित की है जहां प्रतिदिन।पूजा भी की जाती है।उनको मारने के।लिए सरकार को सेना का सहारा भी लेना पडा़ था उनके।गिरोह में स्थाई और अस्थाई सदस्यों कुल साढे चार सौ के आसपास थी ।राम बाबू और दयाराम का चचेरा भाई गोपाल गडे़रिया सहित सभी को 5 अगस्त 2006 में शिवपुरी के।जंगलों।में।इनकाउंटर में।मारागया ।जगजीवन परिहार कोई मन्नत मान कर दाढी मूछ और बाल बनवाकर आया 15 मार्थाच 2007 मेंपुलिस को मुरैना जिले के गढिया गांव में उसके होने की सूचना मिली उस गांव में।उसकी क ई रिश्तेदारियां थी। हीरा सिह के मकान में नीचे गिरोह के।सदस्य थे सबसे लम्बी 19 घंटे तक चली मुठभेंड़ में जगजीवन समेत पूरा गिरोह और भाई भी मारे गये पुलिस दल ने हीरा सिंह का मकान बम से उडा़ दियाथा ।फूलन देवी मात्र सांसद बनी बाद में।उनकी हत्या कर दी गयी ।पानसिंह तोमर भी पहले फौज में थे और एथलीट भी थे ।1950 और साठ के दशक में स्टीपल चेज में सात बार राष्ट्रीय चैम्पियन भी रहे । 1952 के एशियाई खेलों में देश का प्रतिनिधित्व भी किया था। ग्वालियर के पोरसा के पास भिडोंसा गांव में जन्मे पान सिंह का जन्म हुआ था समय से पूर्व सेवानिवृत्ति के बाद गांव लौटे पान सिह को पता चला कि घूसखोर कर्मचारियों से मिल घर के अन्य सदस्यों ने सारी सम्पत्ति अपने नाम करा ली है इसकी शिकायत पुलिस प्रशासन से की तो उल्टे पुलिस ने इन्ही को परेशान करना शुरू कर दिया बादमेंइनके घर के अन्य सदस्यों।इनपर बंदूक से हमला कर दिया और इनकी मां की हत्या कर दी ।इन्होने चम्बल की शरण ली । बाद में पान सिंहने बाबू सिंह तोमर और रामेश्वर सिंह तोमर, जंडैल सिंह तोमर तीनो की हत्या करदी थी ।अक्टूबर 1981 में पुलिस को।उसके एक गांव में गैंग के 18 सदस्यों।के।छिपे होने।की जानकारी मिली और पुलिस ने तत्काल गांव को घेर लिया और नौ घंटे की मुठभेड़ के बाद पान सिंह और।उसके गरोह का सफाया हो गया । सम्पादकीय -News51.in

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