Sunday, May 26, 2024
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कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने मल्लिकार्जुन खड़गे, सवाल वही-कांग्रेस कैसे पुनः मजबूत होकर केंद्र की सत्ता में आयेगी, भाजपा से टक्कर लेने के रास्ते में क्षेत्रीय पार्टीयों से टकराना होगा जो कांग्रेस के ही वोट-बैंक के बलबूते फल-फूल रही

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी हो गया, अपेक्षित फैसला भी हो गया, शशि थरुर हार गए, मल्लिकार्जुन खड़गे जीत गए, लेकिन आगे क्या? कांग्रेस के सामने प्रश्न वही पुराने हैं। मसलन अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का संगठन मृतप्रायः है, उसे जिंदा कर मजबूत करना पहली प्राथमिकता है, दूसरा सामाजिक आधार पर अपना वोटबैंक जो दूसरे क्षेत्रीय दलों ने हथिया लिया है, उसे वापस लाने के साथ नया वोट बैंक भी तैयार करना। तीसरे त्वरित निर्णय लेने की क्षमता जिसका, हमेशा सोनियां गांधी के नेतृत्व में अभाव था ,जिसके कारण कांग्रेस अंतर कलह के कारण क ई राज्यों और नेताओं को खोना पड़ा ।नौजवानों का नेतृत्व और ओजस्वी तथा जानकार वक्ताओं को आगे करना प्रमुख है साथ ही स्थानीय नेतृत्व को निर्णय लेने की पूरी आजादी देना होगा। हर छोटी से छोटी बात के लिए दिल्ली की तरफ देखना बंद कर ना और चुनाव में 40 प्रतिशत उम्मीदवार बनाने का अधिकार प्रदेश अध्यक्ष को देकर उन्हें जवाबदेह बनाना प्रमुख है। यदि मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनियां गांधी से हुई गलतियों से सबक लेकर इन सभी कमजोरियों को दूर करने में सफल होते हैं तभी वह कांग्रेस को मजबूत करने में सफल होंगे वरना अध्यक्ष बदलने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। भाजपा वर्तमान में पहले की अपेक्षा कुछ कमजोर अवश्य हुई है किंतु अभी भी उसको हरा पाना सम्भव नहीं है क्यों कि कांग्रेस के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा क्षेत्रीय दल हैं जो कांग्रेस के ही वोट-बैंक को लेकर फल-फूल रहे हैं वो सभी अपने -अपने राज्यों में कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी का लाभ उठा कर अब काफी मजबूत स्थिति में हैं उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस आज काफी मजबूत स्थिति में है वहाँ कांग्रेस के पूर्व नेतृत्व की उदासीनता के चलते राज्य में स्थानीय नेतृत्व लगभग 20 साल सेएकदम मृतप्रायः पड़ा है जब भी चुनाव आता है किसी दल से तालमेल करने लग जाते हैं कभी तृणमूल कांग्रेस से तो कभी वामदलों से। लगता है पहले से ही हार मान चुके हैं। आम आदमी पार्टी के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को इस डर से वाक ओवर दे दिया कि कहीं वोटों के बंटवारे से भाजपा न जीत जाय। एकमात्र रैली अनमने ढंग से राहुल गांधी ने किया, इसी प्रकार गलत नीति के चलते और समय से सिद्धु पर कोई कार्यवाही नहीं होने से पंजाब भी इनके हाथ से निकल गया। पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने मात्र दो या तीन जनसभाएं अनमने ढंग से की और वहां बिहार की लोकल समस्याओं के बारे में न बोलकर चीन, पाकिस्तान और इंटरनेशनल समस्याओं पर बोलते रहे। सोनियां गांधी की नेतृत्व मे के .चंद्र शेखर राव के दबाव में आंध्र प्रदेश का बंटवारा हुआ तो आंध्र प्रदेश की जनता कांग्रेस से नाराज हो गई और खामियाजा पार्टी आजतक वहां चुनाव हार रही है और तेलंगाना प्रदेश बनने का लाभ के. चंद्र शेखर राव को मिल गया और उनकी पार्टी की सरकार बन गई कांग्रेस न तीन में हुई ,न तेरह में । यही हाल उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस का है पिछले लगभग 25-30 सालों से कांग्रेस ने यूपी में अपने को मजबूत करने का आधा-अधूरा प्रयास भी नहीं किया गया। जब चुनाव नजदीक आता है तो कभी बसपा और कभी सपा से गठबंधन करने का प्रयास करते हैं अब तो यह हालत यूपी में है कि पिछले चुनाव में सपा और बसपा दोनों ने कांग्रेस से तालमेल से इनकार कर दिया था छोटे-छोटे दलों ने भी हाथ नहीं मिलाया ऐसी दुर्गति तो एक न दिन होनी थी ,हालांकि उस चुनाव में प्रियंका गांधी ने वाक ई वह परिश्रम किया था और कांग्रेस में नया जोश भी पैदा हुआ था किंतु कोई जातिगत या सामाजिक ताना-बाना के कारण कांग्रेस बुरी तरह परास्त हुई लेकिन प्रियंका गांधी की मेहनत का लोहा सभी दलों ने माना। जो पिछले चुनाव में पूरे राज्य में कांग्रेस ने मेहनत और सक्रियता दिखाई और संगठन पूरे प्रदेश में खड़ा किया वैसा पिछले 20-25 साल में हुआ रहता तो शायद पार्टी यूपी में बहुत मजबूत स्थिति में रहती। वही हाल अब महाराष्ट्र, उड़ीसा का है महाराष्ट्र में भी कांग्रेस अन्य दलों के तालमेल से चल रही है यही हाल आसाम का होने वाला है। ये सारी चुनौतीयां नये अध्यक्ष के सामने मुहं बाये खड़ा है अगर कांग्रेस को पूरे देश में फिर से खड़ा करना है तो उसे पहले तो जनता को यह एहसास दिलाना होगा कि क्षेत्रीय दलों से उनका हाल यही होगा जो हो रहा हैजनता को दुबारा अपने पाले में लाना ही होगा और इसके लिए सभी राज्यों में अपना संगठन मजबूती से मजबूत क्षत्रप के साए में खड़ा करना ही होगा ।जैसा कि इस बार यूपी में हुआ है मेरा इशारा मजबूत संगठन के लिए मजबूत और सक्रिय क्षत्रप आवश्यक होता है। तो कुल मिलाकर नये अध्यक्ष के सम्मुख चुनौतीयां बहुत हैं और अगर इन चुनौतियों से निपटने में मल्लिकार्जुन खड़गे सफल होते हैं तभी नया अध्यक्ष बनाने का कोई मतलब होगा अन्यथा सब कसरत बेकार होगी।

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