कांग्रेस में अपने जमाने के मशहूर और नामचीन नेता कांग्रेस में राहुल गांधी से क्यों नाराज रहते हैं मैं कइ नाम आपको बता सकता हूं,जैसे दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत, सलमान खुर्शीद, शकील अहमद, अखिलेश प्रसाद सिंह और कुछ और नाम भी हैं जो इस समय याद नहीं आ रहे हैं दिग्विजय सिंह, शकील अहमद, जैसे दो-तीन नेता तो राज्य सभा में जाना चाहते हैं,सलमान खुर्शीद ,कमलनाथ कांग्रेस में अपना पुराना रूतबा हासिल करना चाहते हैं और कई नेता लालच या अन्य कारणों से पार्टी छोड़ना चाहते हैं, तो पार्टी छोड़ने के लिए कुछ न कुछ बहानेबाजी भी चाहिए सबसे आसान तरीका होता है कि राहुल गांधी जल्दी किसी से मिलते नहीं हैं दरअसल राहुल गांधी की ने चूंकि अपने पूर्वजों की गलती से छुटकारा लेकर अपनी सोच के मुताबिक नयी कांग्रेस बनाना चाहते हैं जिसमें लगभग 50% युवा हों,पिछड़े वर्ग के हों,अनुसूचित जाति ,जनजाति के हों महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व पूरा हो ,इसके अलावा राहुल गांधी के पास सबको लमायोजित करने के लिए जगह नहीं है अधिक से अधिक तीन राज्य सभा के लिए उनके पास जगह है, लेकिन राहुल बिना हिचक के और बिना किसी की नाराजगी को देख अपना संगठन मज़बूत करने पर जोर लगाए हैं हालांकि मणिशंकर अय्यर जैसे जनाधार विहीन नेता अक्सर कुछ न कुछ बोलते हैं लेकिन राहुल गांधी ऐसे नेताओं को पार्टी से नहीं निकालते,इस कारण अन्य का मन भी बढ जाता है, अब असम के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ दिया है और शीघ्र ही कन्ही कारणों से भाजपा में चले जायेंगे, स्वयंम असम के मुख्य मंत्री हेमंता विस्वशर्मा ने ही इसे बता दिया है भूपेन बोरा 2016 से एक भी चुनाव नहीं जीते हैं और राहुल ने उन्हे मनाने की गलती भी कर दी, यहां मैं बताना चाहता हूं कि जो जाना चाहता है, उसे जाने से कोई रोक नहीं सकता, दरअसल नेताओं को दो-चार इलेक्शन जीतने पर यह गलत फहमी हो जाती है उन्हे जानना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता जिसे चाहेगी वह जीतेगा राहुल गांधी को अपने मिशन को चालू रखना होगा, वह अगर जिस तरह की जुझारू कांग्रेस बनाना चाहते हैं,बनाएं, जो नेता उनके खांचे में फिट न हों, बेहिचक उन्हे अपनी टीम में शामिल न करें पुरानी ताकत कांग्रेस में नहीं है कि सबको समायोजित कर सकें, मेहनती और जुझारू और अपनी सोच को लेकर बढें अपने माता-पिता की पुरानी कांग्रेस को चलना अब उनके लिए सम्भव नहीं है उन्हे अपनी सोच के अनुसार (नये नौजवान साथी, नई सोच, अति पिछड़ा, पिछड़ा, अनुसूचित जाति,जनजाति महिलाओं की भागेदारी,मजदूरों गरीबों,अल्पसंख्यकों की)अपना संगठन बनाना ही होगा । -सम्पादकीय-News51.in
