Friday, June 14, 2024
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वामपंथी विचारधारा का प्रभाव

वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव के कारण उन पर अमेरिका और कोलम्बिया सरकारों द्वारा देश में प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया था। ये वही लोग थे जिन्होंने यूरोपीय देशों की जहीन जीवन शैली की प्रयोगों पर आधारित सभ्यता वाले अपने से एकदम उलट मैक्सिकन और लैटिन अमेरिकी सभ्यता को ” अनपढों – गवारों की सभ्यता मानते रहे… इस चलन, सोच को तोड़ा… नोबेल पुरस्कार विजेता गार्सिया मार्खेज ने।

गार्सिया मार्खेज क्यूबा के प्रेसिडेंट फिदेल कास्त्रो के दोस्त थे, उन्होंने कहा था कि मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति को नही जानता जो सी-फूड के बारे में कास्त्रो जितना जानता हो। साथ ही कास्त्रो को बहुत पढ़ाकू बताया था। एवं आश्चर्य व्यक्त किया था कि इतना व्यस्त होने के बाद भी कास्त्रो पढ़ने के लिए समय कैसे मैनेज कर लेते हैं।

गार्सिया मार्खेज 1927 मे कोलंबिया देश में पैदा हुए थे। उन्हें अपने उपन्यास One hundred years of Solitude पर साहित्य में 1982 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जिसके माध्यम से उन्होंने ” तिलिस्मी यथार्थवाद के ग्रे वर्ल्ड ने यूरोपीय वैज्ञानिकों को विवस किया कि वे छायाओं मे भी जीवन को माने और तलाशें। लोक यानी जड़ों, कलाओं, व्यक्ति, समाज मे जीवन को तलाशें। लोक जीवन में ही ऐसी सच्चाइयां दबी हुई है जो कथित प्रयोगवादी और संभ्रांत जीवन का आधार रही हैं। वे नींव के वो पत्थर हैं, जिनपर कई मार्खेज छपते चले गये होंगे चुपचाप, एकदम साधे।
हम भारतीयों की भांति मार्खेज की कहानियाँ हमें बताती हैं कि अपने लोक जीवन से जुड़ा होना, उसके अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही प्रगति के हर सच को जानने का एक बढ़िया साधन हो सकती है। हम जीवन के मार्मिक अनुभवों को जीयें और उन्हें प्रगति का सहायक मानें ।

भूमण्डलीकरण ने राष्ट्रीय संस्कृतियों, परम्पराओं, रीति- रिवाजों, को एकीकृत बाजार में बदल कर निष्प्राण कर दिया है। भूमण्डलीकरण का पहिया दुनिया को रौंद रहा है। राष्ट्र, समाज, समुदाय सबको बेमानी बना दिया है। ऐसे में गार्सिया मार्खेज आवाज बनते हैं, समाज में हाशिये पर फेंक दिये गये लोगों, वर्गों और समूहों का जो दुनिया- भर में शक्ति और प्रतिष्ठा प्रदान करने की कोशिश करता है।
इनमें शामिल हैं वो लोग जो भाषा, धर्म, नस्ल, लिंग, क्षेत्र, राजनीति और रोजी- रोटी के सवालों को लेकर शोषित- उत्पीड़ित हैं। माकोंडो ( Mocondo) नामक एक काल्पनिक शहर के इर्द-गिर्द गार्सिया मार्खेज का उपन्यास घूमता है जिसके माध्यम से लैटिन अमेरिका की पहचान एवं परिवेश को रेखांकित किया गया है।

भूमण्डलीकरण के पक्षधरों का कहना है कि तब से अब तक दुनिया काफी बदल गई है।’ माकोंडो ‘ अब निरर्थक हो गया है और उसकी जगह ‘ मकंडो ‘ ( McOndo) प्रतिष्ठापित हो चुका है। शहरों की ओर भाग रहे युवा पीढ़ी के लिए मकंडो मैक्डोनाल्ड रेस्त्रां, (McDonald) मैकिंतोश कम्प्युटरों ( Macintosh Computers) और कन्डोम के समिश्रण का परिणाम है।
जिसमें बहुमंजिली इमारतें, पंच सितारा होटल, कॉम्प्लेक्स, मल्टीप्लेक्स थियेटर, वीडियो क्लब, कैसिनो, डिजिटल ड्रीम्स , यौन सम्बन्ध, नशीली दवाओं और पॉप संगीत है, वहीं बेरोजगारी,गरीबी, भीड़- भाड़, प्रदूषण, नशाखोरी, अपराध- वृत्ति आदि भी बढ़ रही है। ऐसे में युवा को भ्रांति पैदा करती है तो कभी आत्म हत्या की ओर ढकेलती है। कम्पनियों मे कार्यरत पेशेवर युवाओं की टोली जिससे प्रभावित हो रहे हैं उसे कार्ल मार्क्स ने निर्वसन (Alienation) कहा है।

भूमण्डलीकरण के पक्षधरों का कहना है कि अब प्रासंगिक प्रश्न है कि : ‘ मै कौन हूँ..? ‘ जबकि गार्सिया
मार्खेज का प्रश्न था कि : ” हम कौन हैं…? लेेेखक- विश्व जीत सिह, प्रस्तुति- सुुुुुनीलकुमार दत्ता स्वतंत्र पत्रकार एवं दस्तावेजी प्रेस छायाकार वामपंथी

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