Friday, June 14, 2024
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ये कर्बला की जमीं है इसे सलाम करो, यहाँ पत्थर भी नम निकलते हैं

कर्बला की फ़ज़ीलत कोई क्या बयां करेगा जैसा की हिंदुस्तान के मक़बूल शायर मुनौवर राना ने कहा है कि -ये कर्बला की ज़मीन है इसे सलाम करो यहाँ से पत्थर भी नम निकलते हैं ..
कर्बला की जंग इस बात का उदाहरण है कि हक़ के लिए खड़ा होने वाला व्यक्ति भले ही वक्ती तौर पर हार जाए या शहीद हो जाए पर वो और उसका नज़रिया हमेशा के लिए प्रासंगिक हो जाता है ,वहीँ नाहक़ पर परवाज़ करने वाला व्यक्ति भले ही जीत जाए पर कालांतर में न तो उसका इतिहास ,न भूगोल और न ही भविष्य इस ग्लोब पर कहीं टिकने लाएक़ होता है.वही हाल यज़ीद का हुआ ,मुसोलीन का हुआ और हिटलर का भी हुआ .और इनके नज़रिए पर चलने वालों का भी वही होगा .
कर्बला की जंग मुहर्रम के महीने में हुई थी .कर्बला ,इराक़ की राजधानी बग़दाद से 10 किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में स्तिथ एक जगह है ,जहाँ इस्लामिक कलेंडर या हिजरी वर्ष के प्रथम माह ,मुहर्रम में यज़ीद की हज़ारों की संख्या की फ़ौज के सामने पैग़म्बर ए इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैक व सल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ हक़ व इस्लाम की सरबुलंदी के लिए टकरा गए .ये जानते हुए कि उनकी संख्या कमोबेश 40000 के करीब है .तीन दिन भूखे प्यासे रहने के बावजूद इमाम हुसैन र० मैदान में खड़े रहे और आत्मसमर्पण नहीं किया .मुहर्रम की 10 तारीख को( 10 मुहर्रम 61 हिजरी या 10 अक्टूबर ६८० इ०), जिसे आशुरा भी कहते हैं ,इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में हक़ के लिए अपनी शहादत पेश कर दी .ऐसी शहादत न तो दुनिया ने कभी दखी न देखेगी . .उनकी शहादत को कोइ क़लमकार क़लमबंद नहीं कर सकता .यजीद की फ़ौज का इतना विभत्स कृत्य था कि इमाम हुसैन के 6 महीने के मासूम बच्चे जिनका नाम अली असग़र था को भी शहीद कर दिया .
पैग़म्बर ए इस्लाम ने इस महीने की बड़ी फ़ज़ीलतें बयान की हैं .रसूल ने फ़रमाया कि रमज़ान माह के बाद रोज़े रखने की सबसे ज़्यादा फ़ज़ीलत मुहर्रम के माह की है .इस माह की 9 वी तारीख़ को रोज़ा रखने से कई सालों की गुनाहों को रब माफ़ फरमा देता है .इसी तारीख़ को हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती किनारे को लगी थी .रसूल ने हज़रत इमाम को जन्नत के जवानों का सरदार भी बतलाया है .
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार भारत में मुहर्रम का जुलुस अर्थात ताज़ियादारी 12 वीं शताब्दी में ग़ुलाम वंश के प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में निकलवाई थी .
आपको यह भी बतलाते चलें कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन जो बीमार होने की वजह से युद्ध में शामिल नहीं हो सके थे ,उन्ही से रसूल ए पाक की खानदान चली और दुनिया में जहाँ कही भी हैं सय्यद के टाइटल से जाने जाते हैं .हिन्द के सुल्तान ख्वाजा ए अजमेरी मोईनुद्दीन चिश्ती रह० भी नवासा ए रसूल की आल हैं .
उपरोक्त तथ्य, उत्तरप्रदेश के मऊ जनपद के चिरैयाकोट क़स्बे में स्तिथ मदरसा दारुल उलूम कादरिया के मुदर्रिस मौलाना अख्तरुल इस्लाम क़ादरी से हमारी बात चीत से मिली जानकारी पर आधारित है ।
…..मुहम्मद अख्तर ….पत्रकार।

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