Sunday, April 14, 2024
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यह काहिरा है, मिस्र की राजधानी, पिरामिड का शहर

पिरैमिड

यह काहिरा है , मिस्र की राजधानी , और उसके पास ही यह गीजा है — गीजा का बालुका प्रसार , दूर तक चमकती रेत | और इस रेतीली दूर तक फैले मैदान में ये नुकीले शिखर वाले आसमान से चोटी खुजाते से ‘ पिरैमिड ‘ है — प्राचीन मिस्रवासियो के ‘ पिर – एम् – डस ‘ ‘ ऊँचे , अत्यंत ऊँचे देवोत्तर | ‘

इन्हें किसने बनया ? कब बनाया ? क्यों बनाया ? ‘ महान पिरैमिड ‘ चार सौ पचास फीट ऊँचा है , उसका आधार प्रत्येक ओर सात सौ पचपन फीट लम्बा है , यह अपने नीचे चालीस बीघे जमीन दबाए हुए है | हाँ दबाए हुए , क्योकि इसमें प्राय: पन्द्रह करोड़ मन चट्टानों का भार है |

पिरैमिड मकबरे है , ताज – सिकन्दरा की तरह मकबरे , एत्मादुद्दौला – करबला की तरह | और ये खड़े है आज पांच हजार वर्षो से , और पहले से , कलयुग के भी पहले से , द्वापर से | राम और रघु से पहले , दुष्यंत – हरिश्चन्द्र से पहले ये खड़े हुए आसमान की ओर रुख किये और तभी से कुछ पूछ रहे है – उसी तरह , जैसे यात्री हैरत में खड़ा कुछ इनसे पूछता है | दोनों स्तब्ध है मूक , जादू से छले से |

इन्हें बनाया मिस्र के ‘ फराऊ ‘ ने | फराऊ – ‘ बड़े मकान में रहने वाला ‘ – मिस्र का प्राचीन राजा , मामलुक – गुलाम बादशाहों से पहले का , अरबी सुल्तानों से भी पहले का , ग्रीक तलेमियो से भी हिक्ससो से भी | और ‘ बड़े मकान में रहने वाला फराऊ |

हाँ , मिस्र जादू का देश है , अपनी इमारतों के रु से तो निश्चय , पर अपनी जमीन के रु से भी | मिस्र की जमीन | इस उत्तर – द्खन्न हजार मील लम्बी जमीन पर बालू कुछ फैली हुई नही है | उसका वह अन्तरंग – बहिरंग सभी है | और यह सारा लम्बा प्रदेश नितांत सुखा है , अनुवर्र्र | सिवा दस मील चौड़े एक पतले किनारे के जो नील नदियो का काठा है |

नील नदी आज की भाँती उस बालू के मैदान में तब भी दूर के अबीसीनिया के पहाड़ से उपजाऊ मिटटी बहा लाती थी , हर साल गर्मियों में अपनी बाढ़ के साथ , और बाढ़ के बाद ही मिस्रियो किसान – पश्चिमी एशिया , अरब और आंतरिक अफ्रीका के निवासियों का एकस्थ – पौरुष – उस मिट्टियो पर टूट पड़ता | मिटटी में वह बीज डाल देता और एक के बाद एक तीन फसले काट लेता | दुनिया के किसी किसान को यह न्यामत मुअस्सर नही | मुसीबतों के बीच , रेगिस्तान के बीच जल विहीन देश के बीच मिस्र की जनता को नील नदी की यह देंन थी और मिस्र के मेहनती किसान ने उस देंन को व्यर्थ न जाने दिया |

क्रमश – आभार ‘ इतिहास के पन्नो पर खून के छीटे – भगवत शरण उपाध्याय द्वारा सुनील कुमार दत्ता, स्वतंत्र पत्रकार एवं दस्तावेजी फोटो छायाकार

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