Sunday, May 26, 2024
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ब्राह्मण -एक जाति मात्र नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड की धुरी

ब्राह्मण

आज जो मुझे गाँवों में दिन – हीन अवस्था में देखता है , उसे गुमान भी नही हो सकता कि सदियों की कुछ में मैंने साम्राज्यों का संचालन किया है और अविरल जनसंख्या मेरे संकेतो पर नाचती रही है | ना , मैं अब – सा दीन कभी न था | यह मेरे चरम उत्कर्ष का वैषम्य है | गाँव में वस्तुत: मेरे प्रेत की छाया डोल रही है | मैं ब्राह्मण हूँ , मेरी कहानी ब्राह्मण की है — दृप्त ,उद्दंड , ज्ञानपर |
मैं केवल भारत का ही नही हूँ | सारे संसार की प्राचीन सभ्यताओं का मैं संचालक समर्थ अंग रहा हूँ | मिसरी राजाओं का मैं विशेष सुहृद था | उस अदुत अनुलेप का आविष्कार मैंने ही किया था , जिसके कारण मिस्र के पिरामिडो के विख्यात ममी सुरक्षित रखे जा सके | पिरामिडो की चट्टाने तो बिखर चली , पर उनके भीतर रखे शरीर को किसी प्रकार की क्षति न हुई ईसा से प्राय: आठ हजार वर्ष पहले ही मैंने उस अनुलेप – द्रव्य की खोज कर ली थी | निश्चय ही कि इस रहस्य की जानकारी से मेरी शक्ति मिस्र की जनता पर असाधारण मात्र में बढ़ गयी थी | इसी प्रकार दक्षिण – बाबुल की प्रारम्भिक सभ्यता के केंद्र सुमेर में भी मैंने ईसा से प्राय: पाँच हजार वर्ष पूर्व ही अपनी शक्ति प्रदर्शित कर दी थी | केंगी के शाह के रूप में तब मेरा नाम एन -शाग -कुश – अन्ना था ; परन्तु तभी मैं एन – लिल अथवा बेल्का ‘पतेसी'( पुरोहित ) भी था — ठीक उसी प्रकार , जैसे पिछले काल में तुर्की का सुल्तान खलीफा था | तब की मेरी शक्ति का अंदाज नही लगाया जा सकता | तभी तो मैं अपनी मृत्यु पर दफनाये जाने के समय अनेक दास दासियों को जीवित दरगोर कर पाता था | अनेक रानियों और दास – दासियों को विष के घूँट पीकर दम तोड़ना पड़ता था , जिससे परलोक में उनका मेरा साथ हो सके और मुझे किसी प्रकार की असुविधा न होने पाए | इसी कारण घोड़े , खच्चर , गधे , रथ और अनेकानेक आवश्यक वैभव और अनिवार्य वस्तुओ के साथ मैं समाधि लेता था |
और इस सम्बन्ध में मैं अकेला न था | प्राचीन चीन और भारत में भी मेरी शक्ति का बोलबाला था | सैन्धव सभ्यता में भी मैं अनेक प्रकार से अपने प्रताप का अर्जन करता था और यद्दपि वहाँ मैं अपना बाबुली वैभव प्राप्त न कर सका , कयोकी वहाँ राजा और पुरोहित भिन्न – भिन्न थे , फिर भी पुजारी होने के नाते मेरा तेज यहाँ भी कुछ कम न था | मैं अपने उसी प्राचीन भारतीय रूप की कहानी कहने जा रहा हूँ , जिसने मोहनजो -दड़ो, झुकार -दड़ो, कान्हू – दड़ो, हडप्पा आदि में अवतार लेकर अपने यश और प्रभुता का विस्तार किया था और जिस की पराकाष्ठा वास्तव में ऋग्वेद द्वारा प्रसुत परम्परा के उत्कर्ष में हुई थी | इस प्रकार मेरी कहानी , जो इस देश में विशेत: ऋग्वैदिक सभ्यता से प्रारम्भ होती है , अत्यंत रोचक है |
मैं पहले कह चूका हूँ कि मैं केवल भारत का नही हूँ और मेरा आरम्भ अत्यंत प्राचीन काल में हुआ था — शायद तब , जब आदिम मनुष्य ने पहले पहल वन्य पशुओ की और छलांग मारी थी और झरने का अविरल स्वर सुना था | परन्तु उसकी कथा बड़ी पुरानी है , मैं नही कहूंगा , कम से कम इस प्रसंग में नही | ऋग्वैदिक परम्परा में मैं भारतीय नही हूँ | जिस देश से प्राचीन ऋग्वैदिक आर्य आये थे , मैं वही से आया था , कयोकी मैं ही उनका नेता , उनका मंत्रदाता था | और जहाँ जहाँ उनकी बेले गयी – इरान -ईराक ग्रीस -रोम- फ्रांस इंग्लैण्ड -जर्मनी और लिथुआनिया में – सर्वत्र मैं आर्य टोलियों के आगे था — उनके देवताओं को प्रसन्न करने वाला , उनके भविष्य का प्राक्कथन करने वाला , वस्तुत: उनके देवताओं का अपने मानव रूप में प्रजनक |
भारत में मैं भी अपनी शक्तिम हिंस्र टोलियाँ लिए आया | मैं चला तो भूख से आहार की तलाश में था , परन्तु मेरा नारा था — कृण्वन्त विश्वमार्यम | मैं गायक और द्रष्टा न होता तो भविष्यवक्ता कैसे बनता ? रहस्य में , अज्ञात में झाँककर देखना मेरा काम था | यही मेरी शक्ति का आधार था | मैंने धर्म से साक्षात्कार किया — उस धर्म का , जिसे कोई और नही जानता था , जान ही नही सकता था | अन्य के जानते ही मेरी शक्ति बट जाती और शक्ति बट जाने पर मैं पंगु हो जाता | शिरकत में शक्ति मारी जाती है | मैं साझीदार स्वीकार नही करता | मैं अपना रहस्य अपने तक ही सीमित रखता हूँ — न किसी की शक्ति में हाथ बटाता हूँ , न अपनी हिस्सा बटने देता हूँ | इसी विचार से मैंने राजा को भी परिमित शक्ति का भरसक न होने दिया सर्वदा उसकी ठोस , अविभाजित अपरिमित शक्ति का प्रजनन , विकास और पोषण किया | यही रहस्य – ऋषि – धर्म , दृष्टि की द्रष्टा का – मेरी शक्ति की आधार शिला था और जैसा कि पहले कह आया हूँ इसमें मैं कोई साझीदार नही चाहता था | इसीलिए मैंने विश्वामित्र से रण ठाना , इसीलिए सदियों के दौरान मैं दूसरो के रक्त का प्यासा हो गया और अन्य मेरे रक्त के ग्राहक हो गये | क्रमश : भाग – एक

प्रस्तुती सुनील दत्ता – स्वतंत्र पत्रकार – समीक्षक

आभार — खून के छीटें इतिहास के पन्नो पर — भगवत शरण उपाध्याय

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