Monday, April 22, 2024
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बीते दिनों की रेजीडेंसी यात्रा -भाग-2

बीते दिनों की यात्रा रेजीडेन्सी क्रमश: भाग दो

लखनऊ शहर रेजीडेन्सी के खंडहरो पर उधर से गुजरने वालो की निगाह पड़ जाना स्वाभाविक है |
अंग्रेजो को क्यो इतना प्यार था रेजीडेन्सी से आइये पड़ताल करते है , ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास में लखनऊ की रेजीडेन्सी का अति विशेष स्थान है | अंग्रेज इसे अपने गौरव के प्रतीक के रूप में देखते है | वे इसे कितना महत्व देते है , इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में इंग्लैण्ड का झंडा यूनियन जैक केवल दो स्थानों पर चौबीस घंटे फहराया जाता था — इंग्लैण्ड के शासक के आवास और लखनऊ की रेजीडेन्सी पर | इनके अतिरिक्त हर स्थान पर प्रात: झंडा चढाया जाता था और सांयकाल उतार लिया जाता था |

मार्टिनियर पोस्ट —

मेजर जनरल क्लाउड मार्टिन की वसीयत के अनुसार उनके द्वारा बनाई गयी बिल्डिंग में योरोपियन तथा एंग्लो इन्डियन लडको के लिए लखनऊ में शहर के पूर्व की और उन्ही के नाम पर ला — मार्टिनियर स्कुल ( अब ला कालेज ) वर्ष 1840 में खोल दिया गया | उसके लगभग डेढ़ दशक के उपरान्त 1857 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम छिड़ गया |
सुरक्षा की दृष्टि से उस स्कुल के सभी छात्रो एवं स्टाफ को रेजीडेंसी के अहाते में स्थित एक मकान में रखा गया | जो शाह बिहारी लाल नामक एक भारतीय शाहकार का था |
जब रेजीडेंसी की सुरक्षा की तैयारी की जा रही थी तो शाह बिहारी लाल के इस घर को एक सुरक्षा चौकी के लिए चिन्हित किया गया तथा उस पोस्ट चौकी का नाम स्कुल के नाम पर ही ”मार्टिनियर पोस्ट ” रख दिया गया | उसकी रक्षा में 32वी रेजिमेंट के सैनिक , स्कुल के स्टाफ तथा 50 वरिष्ठ छात्र कालेज के प्रधानाचार्य श्री शिलिंग की कमान में तैनात कर दिए गये | सीनियर ब्यायास में एडवर्ड हेनरी हिल्टन नामक छात्र जिसके पिता कालेज में सहायक मास्टर थे , दोनों पुरे समर के दौरान रेजीडेंसी की उपरोक्त चौकी की रक्षा में लगे रहे | बाद में ई.एच हिल्टन ने अपनी पुस्तक वर्ष 1858 में प्रकाशित की थी जो रेजीडेंसी पर एक विश्सनीय दस्तावेज है |

बेगामवाली कोठी —

रेजीडेंसी मुख्य भवन के दक्षिण की और स्थित कोठी का पहले कोई नाम नही था किन्तु 1857 के बाद इसे बेगम वाली कोठी कहकर पुकारा जाने लगा | यह कोठी एक ऐसी महिला की थी जिसने अपने पहले पति जान काल्युडन की मौत के बाद मिस्टर वाल्टर से शादी कर ली | उस कोठी में वह अपनी दो बेटियों तथा अपने इकलौते बेटे जोजफ के साथ रहती थी | कालान्तर में उसने मुस्लिम व्यक्ति से शादी कर के इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया | उनकी छोटी बेटी का निकाह तात्कालीन अवध के बादशाह नवाब नसीरुद्दीन हैदर से हो गया उनकी छोटी बेटी का निकाह के बाद बड़ी बेटी और बेटे ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया | 1857 में क्रान्ति के दौरान उन्होंने अंग्रेजो को अपनी महत्वपूर्ण सेवाए दी |

इमामबाड़ा सरफ- उन – निसा —

बेगमवाली कोठी में दो प्रागंण है जिनमे से एक में इमामबाड़ा है | इस इमामबाड़े का निर्माण मिसेज वाल्टर की बड़ी बेटी ने इस्लाम धर्म में शरीक जो जाने के बाद कराया था | अत: उन्ही के नाम पर यह इमामबाड़ा है |

मस्जिद —
सरफ – उन – निसा ने इमामबाड़े के उत्तरी – पश्चिमी और एक मस्जिद का निर्माण कराया | मस्जिद देखने में बहुत बड़ी नदी है इस पर इसकी मीनारे व कांगरा काफी सुन्दर है | यह मस्जिद इस परिवार की निजी सम्पत्ति थी और बाहरी व्यक्ति इसमें नमाज पढने नही आ सकता था | आज भी यह मस्जिद रेजीडेंसी के अहाते में खड़ी है , किन्तु अब इसमें नमाज अदा करने के लिए कोई भी आ सकता है खासकर जुमा के दिन |

बिग्रेड मिस अथवा किंग्स हास्पिटल –
इस स्थान को किंग्स हास्पिटल के नाम से जाना जाता था | इसकी सुरक्षा में अनेक सैनिक सैनिक व अधिकारी कर्नल मास्टर्स की कमान में रखे गये थे | यह अगले पोस्ट की चौकी थी |

सिक्ख स्क्वावर —

स्वतंत्रता क्रान्ति के दौरान अवध के जो सिपाही बंगाल रेजिमेंट में थे उनको वहाँ से हटा कर उनके स्थान पर पंजाब से सिक्ख रेजिमेंट को बुला कर तैनात कर दिया गया था | 18 अगस्त 1857 को भारतीय क्रान्तिकारियो के बारूदी सुरंग द्वारा किये गये एक हमले में एक मकान की छत ध्वस्त हो जाने से कई सैनिक मलबे के नीचे दब गये थे |

शीप हाउस ( भेड़ खाना )

छोटे – छोटे घरो की कतार का प्रयोग सेना के रसद विभाग द्वारा स्लाटर हाउस भेजी जाने वाली भेड़ो को रखने के लिए किया जाता था | स्लाटर हाउस और शीप हाउस की चौकियो की रक्षा के लिए सिविलियन्स को लगाया गया था जिसकी कमान 7वी घुड़सवार के कैप्टन वोइलियु के हाथो में थी |

स्लाटर हाउस पोस्ट —-
सेना के रसद विभाग की देखरेख में वहाँ के पशुओ को हलाल कर उनका मीत खाने के लिए तैयार किया जाता था | वहाँ छोटे – छोटे बहुत सारे घर थे जो मूल रूप से नौकरों के लिए विशेष कर खानसामाओ के लिए तथा पशुओ को रखने के लिए प्रयोग में लाये जाते थे | उसका रास्ता एक अलग फाटक से था जिसे ‘घडियाली दरवाजा ” कहा जाता था |

कानपुर तोपखाना —
इस तोपखाने को कानपुर तोपखाने की संज्ञा इसलिए दी गयी थी कयोकी ये कानपुर मार्ग रेजीडेंसी के पूर्व वाली सडक की और लगती है | ये तोपखाना रेजीडेंसी में जून माह के प्रथम सप्ताह में लेफ्टिनेंट जे सी एडरसन के निर्देशानुसार गठित किया गया था तथा इसका अस्न्चालन 37 वी रेजिमेंट के कुछ सैनिक रेड्किल्फ़ की कमान कर रहे थे | कानपुर तोपखाने में एक टॉप 18 पाउंड तथा एक टॉप 9 पाउंड की रखी गयी थी | इसके अतिरिक्त जोहांस हाउस को कवर करने वाली 9 पाउंड टॉप मार्टिनियर पोस्ट के सामने लगाई गयी थी जिसका रुख गोलागंज की और था | क्रमश : संस्मरण -सुनील कुमार दत्त उर्फ कबीर

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