Sunday, May 26, 2024
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नजाकत का शहर -लखन ऊ, राजा टिकैत राय(1760-1808)

नजाकत का शहर लखनऊ
राजा टिकैतराय – 1760 से 1808
टिकैतराय अवध में इतने लोकप्रिय थे की उनके बसाए गये सभी स्थानों के लोग उन्हें अपने नगर का मूल निवासी बताते है | परन्तु समस्त साक्ष्यो का विवेचन करने पर यह प्रमाणित होता है की बाराबंकी जनपद में टिकैतनगर के पास इचौलि नामक कस्बा राजा टिकैतराय का जन्मस्थान है | इसी के पास अपने बसाए टिकैत नगर में उन्होंने बहुत बड़ा बाग़ लगवाया जिसके चारो तरफ लगभग 20 फुट ऊँची और 6फुट चौड़ी चारदीवारी है जिसमे अनादर से शत्रु पर फायर करने के लिए सुराख बने हुए है | इस बाग़ में बहुत से औषधीय पेड़ लगे हुए है | बाग़ का फाटक काफी बड़ा है और उस पर लखनऊ तथा अन्य स्थानों के नवाबी काल के फाटकों की तरह मछली का जोड़ा बना हुआ है | कस्बा इचौली में उनकी बनवाई पांच मंजिली बावड़ी है जिसकी 2 मंजिले उपर से दिखाई देती है | शेष मंजिले इसके बीच बने तालाब के पानी में डूबी हुई है | कहा जाता है की इस तालाब में पांच कुए है जिसके कारण इसका पानी कभी सूखता नही है | इस तालाब में नीचे जाने का ढलवा रास्ता है | इसका कारण यह बताया जाता है की पहले परदे का चलन था और रानिया हाथी पर बैठकर पर्दे में तालाब में स्नान करने जाती थी और हाथी तालाब के अन्दर सीधे घाट पर पहुचा देता था | तीन तरफ सीढियां और एक तरफ ढाल है जो राजा टिकैत राय के बनवाये तालाबो की पहचान और विशेषता है | ढलवा घाट को गऊ घाट कहते है जिससे होकर जानवर पानी पिने जाते थे तथा बरसात के मौसम में बाहरी पानी भी तालाब में भर जाता है | इसी के पास कोट्वाधाम में बाबा जगजीवन राम के मंदिर के बाहर भी राजा साहब का बनवाया तालाब है जिसे अभरन कहा जाता है | इस तलब के पास राजा टिकैत राय का महल था जो अब नही है |
वंश क्रम –
डा योगेश प्रवीन ने अपनी पुस्तक लखनऊ नामा में ( पृष्ठ 71 ) में टिकैत राय का वंश परिचय देते हुए लिखा है की टिकैत राय जाति के कायस्थ थे , जो पटना प्राणनाथ श्रीवास्तव कानूनगो के खानदानी थे | बाद में उनका परिवार गंगा के किनारे डलमऊ में आकर बस गया | वहाँ टिकैत राय पांच साल तक बैसवा के नाजिम रहे जिससे बैसवाड़े की शान – शौकत बढ़ी | यह बताना सम्भव नही है की कब और किन परिस्थितियों में परिवार बाराबंकी जनपद पहुचा | बहरहाल निर्माण कार्य और प्रचलित मान्यता को देखते हुए यही समझ में आता है की टिकैत राय का जन्म इचौली – टिकैत बगर ( बाराबंकी ) में हुआ था | उन्होंने अपनी जन्मस्थली को विविध प्रकार की विशाल और आकर्षक रचनाओं से सजाया | उनके पिता का नाम जयमल था | इनकी पत्नी का नाम रुकमनी देवी था जो अपने पति की तरह धार्मिक महिला थी और अपने पति के पुण्य कार्यो की प्रेरणा थी | महा शिवाला , लखनऊ में इन दोनों की संकल्प करती हुई मूर्ति स्थापित है | महाराज टिकैत राय के एक मात्र पुत्र का नाम राजा निहाल् राय था जिनके इकलौते पुत्र भवानी राय थे | यह भी अवध दरबार में थे | लखनऊ में भवानी गंज मोहल्ला आबाद करने का श्रेय आपको है | राजा भवानी राय के पुत्र राजा हनुमन्तबली था | इनके बाद ही इनके उत्तरजीवियो ने बली नामान्ता लगाना शुरू किया | बाराबंकी की दरियाबाद रियासत के स्वामी भी बली नामांत का उपयोग करते थे , परन्तु वे माथुर कायस्थ थी | इसी परिवार में उमानाथ बली , राजेश्वर बली आदि हुए | बली उपनाम के कारण लोग अक्सर दोनों परिवारों को एक समझने लगते है | वास्तव में में दोनों अलग – अलग कुल से सम्बन्ध रखते है | राजा हनुमंत बली की एक मात्र कन्या का नाम रानी ठाकुर कुंवरी था | उनका विवाह रजा शिवप्रताप राय के साथ हुआ | आप अपनी ससुराल की डायड पर रह गये | इनके पुत्र राजा भगौती प्रसाद हुए | ये भी अपने पूर्वजो की तरह अपने पिता के एक मात्र पुत्र थे | इनके पुत्र राजेश्वर बली हुए जो उत्तर प्रदेश सबा में डी आई जी के पद से मुक्त हुए | इनके पुत्र राय रवि बली का विवाह लखनऊ के प्रसिद्ध वकील रामजी दास की पुत्री से हुआ है जो फतेहपुर के चौधरी खानदान के वारिसो में से एक थी | राजा टिकैत राय के एक भाई राजा निर्मलदास थे जो नवाब बहु बेगम की जागीरो के प्रबन्धक थे | उनका कार्यक्षेत्र अधिकतर गोण्डा और बहराइच रहा गोण्डाऔर बहराइच के गजेटियर में उनके कार्यो का विवरण मिलता है | निर्मलदास के एक दामाद धनपत राय राजा टिकैत राय के अधीन दीवानी विभाग में अधिकारी थे |

सुनील दत्ता कबीर – स्वतंत्र पत्रकार ,दस्तावेजी छायाकार
आभार हमारा लखनऊ शहर नाम

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