Sunday, May 26, 2024
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जीती बाजी कैसे हारी जाती है इसकी जादुई करिश्मा सिर्फ कांग्रेस आलाकमान के पास ही है क्या?

कांग्रेस नेतृत्व आज हर ओर से हताश दिख रहा है एक -एक कर सारे राज्य उसके हाथ से निकलते जा रहे हैं। जहाँ पार्टी की सरकार है या जहाँ नहीं है सभी जगह चार-पांच गुट खुलकर सिरफुटव्वल कर रहे हैं लेकिन आला कमान चुप्पी साधे पड़ा है क्षेत्रीय दल जो पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने के लिए लालायित रहते थे अब अकेले लड़ रहे हैं और कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं बनाना चाहते हैं। और अब तो ममता बनर्जी जैसी क्षेत्रीय नेता और के चंद्र शेखर राव जैसे नेता कांग्रेस को छोड़कर क्षेत्रीय दलों का देश व्यापी गठबंधन बनाने की बात करने लगे हैं। उधर कांग्रेस के अंदर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से असंतुष्ट जी- 23 के नेताओं ने भी फिर से सर उठाना शुरू कर दिया है और नये अध्यक्ष के चुनाव की मांग भी कर डाली है जैसा भाजपा चाहती भी है। आखिर ऐसी नौबत आई कैसे, इसको जानना बहुत जरूरी है। सोनियां गांधी, राहुल गांधी की सबसे बड़ी कमजोरी त्वरित निर्णय न ले पाने की क्षमता है पंजाब में एक तो अमरिंदर सिंह को कम से कम दो वर्ष पूर्व ही हटा देना था और फिर नवजोत सिंह सिद्धु आला कमान को बार-बार धमकी देते रहे फिर भी आला कमान उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर पाया उत्तराखंड में भी क ई गुट थे जिसके कारण किसे मुख्य मंत्री बनाना है रावत के खिलाफ क ई हो गए वहां भी आला कमान किसी को न चेतावनी दे पाया न किसी के खिलाफ कार्रवाई कर पाया। इसी प्रकार असंतुष्टों की बात नहीं सुनना भी एक बड़ी कमजोरी है जिसके कारण क ई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। जबतक मजबूत स्थानीय स्तर के मजबूत नेतृत्व को खड़ा नहीं किया जाएगा और उन्हें पूर्ण आजादी कार्य करने की नहीं दी जाएगी, पार्टी का भला नहीं होगा और गुटबाजी खत्म करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे सभी राज्यों में एक नेतृत्व होना आवश्यक है और असंतुष्टों का दमन सख्ती से करना होगा। पूर्ण कालिक अध्यक्ष होना आवश्यक है फिलहाल यही सब मूल कारण हैं जिसके कारण पार्टी की दुर्गति हो गई है। पंजाब में कांग्रेस बेहद मजबूत थी लेकिन मुख्य मंत्री चरनजीत सिंह चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धु का टकराव हार का कारण बना। क ई गुटों में कांग्रेस बंटी थी सिद्धू के खिलाफ बड़ा और कड़ा निर्णय लिया जाना था, नहीं लिया गया पिलपिला नेतृत्व न तो अपना और न ही पार्टी का भला कर सकता है इस समय कांग्रेस पार्टी संकट के दौर से गुज़र रही है जो न तो कांग्रेस और न ही देश के हित में है देखना है कैसे इस बार इन सभी संकटों से सोनियां गांधी कांग्रेस को बाहर निकालकर पार्टी को दुबारा पुनर्स्थापित कर पाती हैं या फिर स्वयंम इस्तीफा देकर किसी अन्य को अध्यक्ष बनाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं ?

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