Saturday, July 13, 2024
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क्या मायावती के उत्तर प्रदेश में कमजोर होने का खामियाजा भाजपा पर भारी पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश में सभी दलों ने विधान सभा चुनाव जीतने के लिए अपनी -अपनी तैयारियों में जुटा हुआ है, सिवाय मायावती और उनकी पार्टी की तैयारी छोड़ कर। उनकी पार्टी की विधान सभा चुनाव की तैयारीयों में दिखाई जा रही उदासीनता पर सभी दलों में भाजपा को छोड़कर खुशी है उनके दल ने 3 साल में 4 प्रदेश अध्यक्ष बदले हैं। उसपर उनके बयान ने कि सपा को हराने के लिए वह भाजपा का साथ भी देने को तैयार हैं, ने अल्पसंख्यक समुदाय को बुरी तरह नाराज कर दिया है और उनके मूल वोटर दलित समुदाय को भी उद्वेलित और नाराज कर दिया है। उत्तर प्रदेश में दलितों पर जितने भी उत्पीड़न की कार्यवाही पर न उन परिवारों से मिली न ही कोई आंदोलन ही उनके पक्ष में कीं। उनसे कहीं ज्यादा कांग्रेस ने उनकी लड़ाई में बढचढ कर आंदोलन, प्रदर्शन में किया जिनका कुछ न कुछ लाभ कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। लेकिन सबसे ज्यादा लाभ की स्थिति में सपा है। पिछले 2017 के विधान सभा चुनाव में मायावती की पार्टी बसपा को 22.23 प्रतिशत वोट पाकर 19 सीट मिली थी और सपा को 21.82 प्रतिशत मत मिले थे और उनको 47 सीट मिली थी कांग्रेस को 6.25 प्रतिशत वोट मिले और सीट मात्र 7 मिली वहीं भाजपा को 39.67 प्रतिशत वोट मिले और सीटें 312 मिली थी यानि लगभग 6०प्रतिशत से कुछ ही कम विपक्ष में बंटा था मात्र लगभग 40 प्रतिशत वोटिंग भाजपा के पक्ष में हुई थी। अब यही असली समस्या भाजपा की है कि मायावती की पार्टी बसपा के वोटर खासकर अल्पसंख्यक सपा और कांग्रेस में जा रहे हैं और दलित समुदाय क ई दलों में विभक्त हो गया है उस समुदाय का वोट जो भाजपा को मिला था पिछले चुनाव में, वही लगभग एक दो प्रतिशत के हेरफेर के साथ इस बार भी भाजपा को ही मिलेगा लेकिन उसमें बसपा, चंद्र शेखर उर्फ रावण की पार्टी को और सबसे ज्यादा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है सम्भवतः लगभग 5 प्रतिशत सपा को भी मिल सकता है। इस कारण मायावती निष्क्रय और हताश हो चुकी हैं और उनकी तरफ से प्रचार का जिम्मा सतीश मिश्र ने उठा रखा है। मायावती ब्राहमणों को अपने तरफ लाकर डैमेज कंट्रोल करना चाहती थीं लेकिन ब्राह्मण पहले से ही सबसे ज्यादा भाजपा ,में फिर सपा और कांग्रेस तीनों में ही बंटा था में था इधर गोरखपुरमें पूर्वांचल के सबसे बड़े और ब्राह्मणों के दिग्गज नेता पं. हरिशंकर तिवारी के अपने पुत्रों के साथ बसपा छोड़ कर सपा में आ जाने से भी मायावती का हर दाँवपेंच विफल है जिसका फायदा कांग्रेस और सपा उठा रही है इसी कारण मायावती का बेहद कमजोर होना भाजपा के लिए कहीं न कहीं मुसीबत बनता जा रहा है वरना अगर बसपा मजबूत होती तो तीनों विपक्षी पार्टियों में वोट का बंटना, जिस प्रकार पिछले 2017 के विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ था, इस बार ऐसा होता नहीं लग रहा है। इसी कारण मै बार -बार अपने लेख में यह बात कह रहा हूं कि कांग्रेस इस विधान सभा चुनाव में बसपा से ज्यादा सीट जीतने जा रही है। सम्पादकीय – News 51.in

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