Sunday, June 23, 2024
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क्या जेएन यू के छात्र नेता प्रियंका गांधी की पसंद बने हुए हैं ?

जबसे प्रियंका गांधी ने जेएनयू के लेफ्ट माइंडेड 2007 के अध्यक्ष संदीप सिंह AisA से जुड़े थे, को अपना पर्सनल सचिव बनाया है उनके ही कहने पर छांट-छांट कर जेएनयू के छात्र नेताओं को, जो बेहद मेहनती, भारतीय राजनीति के जानकार हैं और सबसे बड़ी बात शानदार वक्ता हैं को पार्टी में लिया जा रहा है और कम्प्यूटर आदि के भी अच्छे जानकार हैं राहुल गांधी ने 2003 में अपनी टीम बनाई थी उस समय राहुल गांधी स्वयंम 33 वर्ष के थे और उनकी टीम में जितिन प्रसाद 30 वर्ष, आरपीएन सिंह 39 वर्ष, सचिन पायलट 26 वर्ष थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया मिलिंद देवड़ा ,मनीष तिवारी आदि भी राहुल के खास थे। जिनमें 10 मार्च 2020 में अनेक आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। 2021 जून में जितिन प्रसाद और जनवरी 2022 में आरपीएन सिंह ने अपने -अपने ढंग से कांग्रेस आला कमान पर आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए मिलिंद देवड़ा जुलाई 2019 में मुम्बई प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कैप्टन अमरिन्दर सिंह भी कांग्रेस से जा चुके हैं और न ई पार्टी बनाकर भाजपा के साथ चुनाव भी मिल कर लड़ रहे हैं मनीष तिवारी भी विद्रोही तेवर गाहे बगाहे दिखाते रहते हैं। सचिन पायलट अकेले साथ हैं। इतने बड़े- बड़े नेताओं के जाने के बाद क ई नये नौजवान लड़के पार्टी में शामिल हुए हैं जिन्हें अपनी पहचान बनानी है जो नये लड़के आये हैं वो सभी प्रियंका गांधी के पसंद के हैं और सबसे बड़ी बात भाजपा के घुर विरोधी हैं। जेएनयू के 2016-17 के छात्र संघ के अध्यक्ष मोहित पांडे की कांग्रेस में इंट्री हुइ है और वे कांग्रेस सोशल मीडिया के इंचार्ज बनाये गये हैं उत्तर प्रदेश में सुधांशु वाजपेई, बनारस की सरिता पटेल, एन जीओ रिहाई मंच के कुछ कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल कराया गया है ये सभी भाजपा के घुर विरोधी हैं सबसे ताजा उदाहरण जेएनयू के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष तेज तर्रार कन्हैया कुमार का जिस तरह स्वागत पार्टी में किया गया है वह एक नये कांग्रेस के बदलाव की तरफ इशारा कर रहा है और पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस में संगठन की चीरफाड़ कर नये सिरे से बदलाव की तैयारी अंदरखाने चल रही है, सूत्र बताते हैं। कांग्रेस में अब काबिल और तेजतर्रार नेताओं को आगे किया जा रहा है जिसकी शुरुआत पांच राज्यों में चुनाव के पूर्व हो चुकी है इसीलिए पुराने नेताओं में बेचैनी है।

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