Tuesday, April 23, 2024
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काशी का मोक्षदायक स्थल -मणिकर्णिका घाट

काशी का मोक्षदायक स्थल मणिकर्णिका
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पुरातन काल या उससे भी पहले हिन्दू समाज ही नही वरण हिन्दुअत्तेर समाज का काशी के प्रति अपार श्रद्धा रहा है |आज भी इसके महात्म्य का यह प्रकाश ही है जिसके आलोक से भारतवासी ही नही अपितु विदेशी भी आलोकित होते है |इस प्राचीन नगरी के कई नाम समय के साथ प्रयोग में रहे है |यथा बनारस ,काशी ,वाराणसी ,अविमुक्त महाश्मशान आदि | अति प्राचीन काल से यह धार्मिक मान्यता चली आ रही है कि काशी में प्राण त्याग ने से मृतक को मोक्ष की प्राप्ति होती है |शायद इसीलिए पूरे देश से अनेको वृद्ध स्त्री -पुरुष मोक्ष कि कामना से काशीवास करने के लिए आते है |ताकि मृत्यु प्रांत उन्हें स्वर्ग कि प्राप्ति हो सके |जो लोग किन्ही कारणवश काशी में प्राण त्याग न कर किसी अन्य स्थान पर प्राण त्यागते है ,मृतक के परिजन उनके शव को काशी में दाह संस्कार हेतु ले आते है ताकि मृतक सीधे मोक्ष का भागी बने |यह भावना आज के वैज्ञानिक युग में भी हर आस्तिक हिन्दू के मन में पायी जाती है |फिर प्राचीन काल में जबकि धर्म प्रधानयुक्त था तथा उस वक्त तो यह प्रवृति अत्यंत बलवती रही होगी तथा काशी में मृत्यु कि इच्छा से आने वाले लोगो कि संख्या भी बहुत अधिक होती गयी |काशी में मृत्यु का यहा तक समर्थन था कि यहा नियमित रूप से आत्महत्या की भी परम्परा थी |जिसकी शास्त्रों में अनुमति भी थी और विधान भी था |
…………………….महाश्मशान ………………………
काशी में मोक्ष प्राप्ति हेतु व नियमित आत्महत्या के फलस्वरूप काशी में मरने वालो कि संख्या अधिक होने के कारण श्मशान स्थल भी अति विस्तृत रहा होगा |शायद इसीलिए काशी को महाश्मशान भी कहा जाता है |गुप्तकाल के पूर्व से ही मणिकर्णिका को वाराणसी को सर्वश्रष्ठ तीर्थ स्थल माना जाता है |मणिकर्णिका से वर्तमान चौक ,राजादरवाजा लेता हुआ बेनिया तालाब ताक (जिसका नाम शायद पहले अतिक्षेप तगाड और कालान्तर में हड्हा तालाब हुआ )और इसके आगे लक्ष्मी कुण्ड तक वाराणसी का श्मशान था |अभी विगत 300 वर्ष पूर्व तक वर्तमान चौक में चिताए जला करती थी जिनकी अस्थियो के अवशेष गंगा तथा हड्हा तालाब में डाले जाते थे |………………………………मणिकर्णिका घाट पर शवदाह परम्परा …………….
……………….मणिकर्णिका को पहले पुष्कर्णी नाम से जाना जाता रहा है |इसकी भी एक अदभुत कथा है –
एक बार भगवान विष्णु ने अपने चक्र से एक कुण्ड का निर्माण किया और उसे पसीने से भर दिया |हजारो वर्ष तक इनके किनारे घोर तपस्या की |जिससे भगवान शंकर वहा आये और प्रसन्न होकर अपना सर हिलाया जिससे रत्नमणि जडित उनका कुंडल उस पुष्कर्णी कुण्ड में गिर पडा | इस प्रकार इनका नाम मणिकर्णिका कुण्ड पडा |मणिकर्णिका घाट पर शव जलाने की परम्परा का आरम्भ 1775 या 1780 के आसपास ही हुआ है |कहा जाता है कि वाराणसी के एक पुराने रईस और अवध के नवाब सफदरगंज के तोपखाने के खजांची लाला कश्मीरीमल खत्री अपनी माँ के शवदाह संस्कार हेतु हरिश्चन्द्र घाट पर आये तो वह पहले से ही अन्य कई शव जलाए जाने हेतु पड़े थे तथा लोग प्रतीक्षा कर रहे थे|लाला जी ने वहा के डोम चौधरी से आग्रह किया कि उन्हें प्राथमिकता देकर पहले शव जलाने की अनुमति दे जिस पर डोमराजा ने कर स्वरूप भारी रकम मांगी |लाला जी इस बात से सहमत भी हो गये |किन्तु शव के साथ आये पहले से ही प्रतीक्षारत लोगो से लाला जी का तीव्र विरोध हो गया जिसके परिणाम स्वरूप लाला जी क्रोधित हो गये और अपनी माँ का शव वापस लौटाकर मणिकर्णिका घाट पर आये यहा पर उन्होंने जमीदारो ,घाटो के पंडो और पुरोहितो से अपनी माँ के शव जलाने हेतु थोड़ी जमीन मांगी |पण्डे और पुरोहित लाला जी कि रईसी तबियत से पूर्व परिचित थे |उन्होंने मजाक में कह दिया कि लाला जी आप जितनी जमीन चाँदी के सिक्को से ढक दीजिएगा उतनी जमीन ही जमीन पर आप को शव जलाने की अनुमति दे दी जायेगी |लाला जी ठहरे मुड़ी आदमी मणिकर्णिका घाट की जमीन पर उन्होंने चाँदी के सिक्के बिछवा दिए और उसी स्थान पर अपने माँ का दाह संस्कार किया |मारे गुस्से में लाला जी ने कुल साठ बोरे चाँदी के सिक्के बिछवाए थे जिनमे थोड़ी सोने कि मुहरे भी थी |बाद में उन्होंने वह सात चबूतरे बनवाए जो विभिन्न जातियों के शवदाह हेतु निश्चित थे |स्वजातीय लोगो के लिए लाला कश्मीरीमल ने एक मजबूत और अन्य चबूतरो से थोड़ा उंचा चबूतरा बनवाया ,जो आज भी विद्यमान है |
……………………..चरण पादुका का शव -दाह परम्परा
मणिकर्णिका घाट पर ही धडा उपर पुष्करिणी (मणिकर्णिका कुन्ड) के निकट एक उंचा चबूतरा है जो चरणपादुका के नाम से विख्यात है |एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु इसी स्थान से होकर पुष्करिणी पर ध्यानस्थ हुए थे |एक स्थान पर मिट्टी गीली होने के कारण उनके पैरो की थोड़ी गहरी छाप पड़ गयी थी |बाद में यह स्थल चरणपादुका के नाम से विख्यात हुआ |धीरे -धीरे यह स्थल धार्मिक मान्यताओं के चलते लोकचर्चा का विषय बना और यह कहा जाने लगा की इस स्थल पर शवदाह करने से जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करती है |बाद में चलकर लगभग सन 1862 के आसपास तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट की आज्ञा से चरण पादुका पर शवदाह की परम्परा आरम्भ हुई |इस सम्बन्ध में भी एक रोचक प्रसंग प्रकाश में आया की वाराणसी के एक रईस शाह परिवार और लाला कश्मीरीमल में रईसी और सम्पन्नता की प्रतिस्पर्धा में बराबर ठनी -ठना होती रहती थी
|हर समय लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने का अवसर खोजा करते थे |चूकि कश्मीरीमल ने मणिकर्णिका घाट पर शवदाह की एक नयी परम्परा कायम की थी ,जो शाह परिवार के लिए प्रतिष्ठा एवं प्रतिस्पर्धा का विषय बन गया था |अत:शाह परिवार ने तत्कालीन काशी नरेश गोपाल मंदिर के गोस्वामी ,राय परिवार तथा काशी के कुछ अन्य प्रतिष्ठित जमीदारो को अपने साथ शामिल कर येन -केन तरह से तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट ऍफ़.डब्लू प्रोटर से चरण पादुका पर शवदाह करने हेतु आदेश प्राप्त कर लिए |इस स्थल पर शवदाह करने हेतु यह शर्त निर्धारित की गयी की उपयुक्त छ:परिवारों में से किन्ही दो परिवार के सदस्य जब किसी को लिखित अनुमति प्रदान करेंगे |तभी जिला प्रशासन चरणपादुका पर शवदाह की अनुमति देगा |कालान्तर में सिर्फ काशी नरेश और जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति से ही शवदाह किए जाने लगे |इस प्रकार सक्षम ,सम्पन्न नामी व्यक्तियों के लिए शवदाह की एक और नयी परम्परा की शुरात हुई |चरणपादुका का प्रथम डाह संस्कार 1863 ई. में तथा अंतिम दाह संस्कार 8 मईसन 1979 के पूर्व तक हुआ था |बाद में काशी के प्रधान तीर्थ पुरोहित पंडित अंजनी मिश्र के नेतृत्त्व में चरणपादुका पर शवदाह बंद करो अभियान चलाया गया ,जिसे स्वामी स्व.स्वामी करपात्री जी ,चारो पीठो के शंकराचार्यों ,काशी के विद्वत परिषद सहित अन्य दूसरे लोगो का भारी समर्थन मिला |इन लोगो ने बताया की चरण पादुका जैसे पवित्र स्थल पर शवदाह संस्कार शास्त्रोचित्त और तर्कसंगत नही है |इसके अलावा में से चार परिवारों के सद्यो ने भी वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट को चरणपादुका पर शवदाह न किए जाने के कड़े आदेश पारित करवा दिया इस प्रकार चरणपादुका पर शवदाह जलाए जाने की परम्परा का अन्त हो गया ………………..कबीर

आभार — बना रहे बनारस , विश्वनाथ मुखर्जी

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