Sunday, May 26, 2024
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ऐतिहासिक त्रासदी -क्याभारतीय शिक्षा व्यवस्था में सबको समान शिक्षा का अधिकार है?

[9/5, 10:59 AM] Sunil Dutta: शिक्षक दिवस —


भारतीय शिक्षा व्यवस्था की त्रासदी की चर्चा आमतौर पर ब्रिटिश इंडिया कम्पनी के शासन काल में लागू की गयी मैकाले की शिक्षा नीति के साथ की जाती है | एक हद तक यह बात ठीक भी है | कयोकी मैकाले और उनसे पहले इसाई मिशनरियों ने इस देश में इसाई धर्म प्रचार के साथ अंग्रेजी भाषा एवं आधुनिक शिक्षा प्रणाली को स्थापित करने का काम किया था | उस शिक्षा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य ही अंग्रेजो जैसी सोच समझ रखने वाले शिक्षित हिन्दुस्तानियों को खड़ा करना था | इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य देश और समाज को शिक्षित कर उसे इस राष्ट्र का जागरूक नागरिक बनाना कदापि नही था | इसके विपरीत उसका उद्देश्य अंग्रेज शासको द्वारा अंग्रेजी शिक्षित हिन्दुस्तानियों के सहयोग सेवा और समर्थन से ब्रिटिश साम्राज्य के आधिपत्य को बनाये रखना था | इस राष्ट्र के श्रम सम्पदा के शोषण लूट एवं प्रभुत्व को बरकरार रखना था | अंग्रेजो से रंग – रूप एवं संस्कृति में भिन्न ये शिक्षित हिन्दुस्तानी हिस्से का समर्थन लेकर उसका विस्तार प्रचार देश के जनसाधारण में करना था |
इस उद्देश्य ने न केवल इस देश की पहले से चली आ रही हिन्दुस्तानी शिक्षा प्रणाली को हतोत्साहित करने का काम किया , अपितु देश के आगे बढ़े हुए हिस्से को राष्ट्र व राष्ट्र के जनगण की ब्रिटिश दासता की गंभीर समस्याओं से अलग करने का काम भी किया | यही कारण है कि 1857-58 तक इस देश का अंग्रेजी शिक्षित बौद्धिक हिस्सा ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों का हिस्सा नही बना था | हालाकि बाद के दौर में खासकर 1857 से लेकर 1880 के बाद से अंग्रेजी भाषा साहित्य एवं अन्य आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने वाले हिन्दुस्तानियों का एक हिस्सा स्वतंत्रता आन्दोलन का अगुवा भी बना | स्वराज के साथ राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्रता आन्दोलन का हिस्सा बनाया उस दौर के राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन का लक्ष्य राष्ट्र स्वतंत्रता के साथ देश की मातृभाषाओं को प्राथमिकता देना और उसका निरंतर विकास करना भी था . साथ ही देश में आधुनिक युग के ज्ञान – विज्ञान की शिक्षा को बढ़ावा देना और उसके लिए अंग्रेजी भाषा को भी बढ़ावा देना और उसके लिए अंग्रेजी भाषा की भी शिक्षा लेना था | आज फिर देश की शिक्षा व्यवस्था एक बड़ी गंभीर त्रासदी से गुजर रही है | देश की सभी केन्द्रीय – प्रांतीय सरकार शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी तथा राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रो की मातृभाषाओं को बुरी तरह से उपेक्षित करने में लगी हुई है | अंग्रेजी भाषा को वह भी अमेरिकन अंग्रेजी को अंधाधुंध रूप से बढावा देने में लगी हुई है | फलस्वरूप आधुनिक युग की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एक बड़े ही अराजकतापूर्ण विघटन की त्रासदी से गुजर रही है | इसे देखकर यही लगता है कि वर्तमान दौर में मैकाले की शिक्षा नीति का असर आज मैकाले के समय से और पूरे ब्रिटिश शासन के काल से भी अधिक है | उच्च एवं बेहतर शिक्षा प्राप्त समुदाय का राष्ट्रीय समस्याओं को उपेक्षित करते जाना भी इसका ज्वलंत उदाहरण है | यह मैकाले और ब्रटिश राज की जीत और राष्ट्रवादियो की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भारी पराजय का परिलक्षण है | शिक्षा व्यवस्था की विघटन – निर्माण से ज्यादा विघटन की त्रासदी इस भारतीय भू – भाग के शैक्षणिक इतिहास में लगातार चलती रही है | अगर हम शिक्षा व्यवस्था के एकदम प्रारम्भिक दौर को अर्थात वैदिक शिक्षा अकाल को ( 2500 ईसा पूर्व से लेकर 500 ईसा पूर्व ) को लें , तो यह दौर शिक्षा को एक अलग सामाजिक संस्था के रूप में स्थापित करने का दौर था | अभी भी लिपि व लेखन का विकास नही हो पाया था | उसका आरम्भ ही हो रहा था | गुरु से शिक्षा ज्ञान सुनकर कंठस्थ करना और फिर उसे बोलकर अभिव्यक्त करना प्रमुख शिक्षण विधि के रूप में प्रचलित था | गुरु का घर या आश्रम ही उस युग के शैक्षणिक संस्थान थे | शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी | समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर एवं अधिकार नही था | हालाकि उस समय के शुरूआती अवस्था में सभी के लिए शिक्षा का अवसर उपलब्ध भी नही हो सकता था | पर उस शुरूआती दौर में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जन्मना जातीय भेदभाव भी नही था | वह हिन्दू समाज के जाति व्यवस्था की संरचना के मजबूत हो जाने के साथ ही सम्भव हुआ | वैसे वैदिक काल की शिक्षा प्रणाली अनार्यो पर आर्यों के प्रभुत्व स्थापित होने के बाद शुरू हुई थी | स्वाभाविक है कि आर्यों के विजय के साथ अनार्यो में किसी रूप में मौजूद शिक्षा प्रणाली को भी जरुर तोडा गया होगा | लेकिन उसी के साथ बाद के दौर में आर्यों एवं अनार्यो के सभ्यता संस्कृति के बढ़ते समागम के अंतर्गत अनार्यो के शिक्षा ज्ञान एवं शैक्षणिक प्रणाली में सुधार बदलाव के साथ अपनाया भी जरूर गया होगा | हंमे इसके ऐतिहासिक प्रमाण तो नही मिल पाए , पर बदलाव की स्वभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया ऐसी ही रही होगी |
हिन्दू धरम और उसमे ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरोध में खड़े हुए बौद्ध धर्म का प्रभाव 500 ईसा पूर्व से लेकर 1200 ईसा पश्चात तक रहा | इस दौरान बौद्ध राजाओं एवं बौद्ध भिक्षुओ ने बौद्ध मठो में बौद्ध शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा दिया | उस दौरान भाषा का माध्यम बदलकर पाली कर दिया गया था | उस समय पाली भाषा जनसाधारण की भाषा भी थी | बौद्ध मठों में शिक्षा ग्रहण करने से आम तौर पर वर्जित चांडाल एवं अन्य घोषित असामाजिक तत्वों के अलावा अन्य सभी जाति समुदाय के लोग वहाँ शिक्षा ग्रहण कर सकते थे | बौद्ध शिक्षा प्रणाली ने बौद्ध धर्म की शिक्षा के साथ हिन्दू धर्म की शिक्षा को अपने पाठ्यक्रम का विषय बनाया रखा | हालाकि अब उसे पहले जैसा महत्व प्राप्त नही था | बौद्ध काल में उच्चस्तरीय शिक्षा के अनेको केंद्र स्थापित किये गये थे | उच्च शिक्षा के पुराने केन्द्रों को सुधार बदलाव के साथ और ज्यादा व्यवस्थित किया गया था | इन उच्च शिक्षण संस्थाओं में पूर्वी बंगाल में ” नादिया विश्व विद्यालय ‘ काठियावाड़ में बल्लभी विश्व विद्यालय उत्तरी मगध में विक्रमशिला विश्व विद्यालय इस समय पाकिस्तान में रावलपिंडी से 20 मील पश्चिम में स्थित तक्षशिला विश्व विधालय पटना के दक्षिण नालंदा विश्व विद्यालय जैसे अन्तरराष्ट्री ख्याति प्राप्त विश्व विद्यालय शामिल थे | 1200 ई० से 1757 तक के मुस्लिम शासन काल में बाहर से आये मुस्लिम शासको ने यहाँ की वैदिक व बौद्धकालीन शिक्षण संस्थाओं को न केवल उपेक्षित कर दिया बल्कि उसे नष्ट करने का भी काम किया | उदाहरण विक्रमशिला – नालन्दा को बख्तियार खिलजी ने 1203 में नष्ट कर दिया | तक्षशिला को तो हूंण आक्रमणकारियों ने पहले नष्ट कर दिया था | यही स्थिति अन्य तमाम छोटे बड़े हिन्दू बौद्ध विद्यालयों की भी हुई | उसकी जगह खानकाह व दरगाह में चलने वाले मुस्लिम धर्म के प्रारम्भिक स्कूल मस्जिद से सलग्न कुरआन स्कूल अरबी स्कुस्कूल तथा मदरसों जैसी शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा मिलता रहा | मुस्लिम शिक्षण संस्थाओं की भाषा अरबी फ़ारसी व अरबी जैसी विदेशी भाषा थी | फ़ारसी को मुख्यत: राजभाषा के रूप में तथा अरबी को धर्म की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया जाता रहा | साथ ही देश की लोकभाषाओ को पाली व संस्कृत को भी उपेक्षित किया जाता रहा मुस्लिम धर्म तथा फ़ारसी अरबी के इन शिक्षण में मुस्लिम धर्मावलम्बियों को ही शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था | समूचा हिन्दू समुदाय राज्य द्वारा प्रोत्साहित शिक्षण संस्थानों में ही शिक्षा ज्ञान पाने से वंचित रहा | कुछ उच्चस्तरीय हिन्दू ही थोड़े उदारवादी कहे जाने वाले सिकन्दर लोदी तथा अकबर जैसे शासको के काल में बेहतर शिक्षा पाने में सफल रहे | हालाकि वे भी भारतीय भाषाओं में नही बल्कि फ़ारसी भाषा में शिक्षित हो पाए | इस देश के हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए भी शिक्षा के अवसर कम ही थे | कयोकी बाहरी मुस्लिम शासको ने अरबी – फ़ारसी के शिक्षण केन्द्रों का भी कम विकास किया | फिर मुस्लिम बादशाहों की प्रतिद्वन्दिता एवं संघर्ष ने भी उस दौर में शिक्षा का विस्तार नही होने दिया | इस मध्य युगीन शिक्षा पद्धति की सबसे बड़ी त्रासदी देश के विभिन्न क्षेत्रो की भाषाओं की उपेक्षा के साथ के साथ 550 सालो तक अरबी , फ़ारसी जैसी विदेशी भाषा का प्रभुत्व पूर्ण विस्तार रहा है |
अंग्रेजो के आने के और 1757 में बंगाल में उनके राज्य की स्थापना के बाद से शिक्षा व्यवस्था में पुन: भारी बदलाव की प्रक्रिया खुद कम्पनी के अंग्रेज अधिकारियों के बीच विवाद का विषय बनी रही | उनका यह विवाद , भारतीय भाषाओं में भारत की पुरानी शिक्षा पद्धति को ही लागू करने के हिमायती प्राच्य्वादियो तथा अंग्रेजी भाषा के साथ पश्चिमी एवं आधुनिक शिक्षा पद्धति के समर्थक पाश्चात्यवादियों के बीच विवाद के रूप में सामने आया | उस विवाद का अन्त 1835 में मैकाले के शिक्षा सम्बन्धी प्रावधानों एवं निर्देशों के रूप में हुआ | उन शिक्षा नीतियों तथा राष्ट्रीय शिक्षा के आन्दोलन के साथ आधुनिक शिक्षा का त्रासद पूर्ण विकास जारी रहा | फलस्वरूप अंग्रेजी भाषा के लगातार बढ़ते प्रभाव प्रभुत्व के साथ देश की भाषाओं का विकास और इस देश की अपनी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का बहुत कम विकास हो पाया |
अब तो वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में उस त्रासदी को अंग्रेजी शिक्षा को सर्वव्यापी बनाते हुए आगे बढावा जा रहा है | विडम्बना यह है की यह त्रासदी अपने आपको राष्ट्रभक्त एवं राष्ट्रवादी कहने वाली सभी राजनितिक पार्तियाओ के उच्चस्तरीय शिक्षाविदो एवं सलाहकारों द्वारा बढावा दिया जा रहा है | नि:संदेह इसे बढावा देने का काम अंतर्राष्ट्रीय , आर्थिक , सांस्कृतिक नीतियों के साथ किया जा रहा है | उसे विश्व बैंक ,यूनिसेफ , यूनेस्को जैसी अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यी प्रभाव प्रभुत्व की संस्थाओं के दिशा निर्देशन के साथ किया जा रहा है | देश का धनाढ्य एवं शासकीय हिस्सा शिक्षण व्यवस्था में उन्ही निर्देशों को मानने और लागू करने में जुटा हुआ है | शिक्षा का बाजारीकरण निजीकरण एवं अंग्रेजीकरण करने में जुटा हुआ है | इसलिए शिक्ष्ण व्यवस्था की त्रासदी को रोकने और राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी वर्तमान दौर की निजीवादी बाजारवादी शिक्षा नीतियों का पुरजोर विरोध आवश्क हो गया है साथ ही 1905-06 की तरह ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मांग व आन्दोलन को आगे बढाने की आवश्यकता है तभी इस देश की शिक्षा में सुधार हो सकता है |
सुनील दत्ता कबीर स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक

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