Monday, April 22, 2024
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आत्ममुग्धता के बोझ तले झुका हमारा देश

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क्वीन्स यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिकों ने आत्ममुग्धता यानी Narcissism पर एक शोध किया है जिससे पता चलता है कि आत्ममुग्ध लोग आसानी से किसी किस्म के डिप्रेशन और तनाव के शिकार नहीं होते। ये लोग दूसरों के विचारों और व्यवहार को अक्सर अपने ख़िलाफ़ मानते हैं ! प्राय: असुरक्षा की भावना से भी घिरे रहते हैं ये लोग जिसके चलते उनका रुख हमेशा हमलावर का होता है !

आत्ममुग्ध लोगों का रवैया भी अक्सर दूसरों को परेशान करने वाला होता है! दूसरों को उनकी इस आदत से कितना क‌ष्ट होत है, इस बात की उन्हें रत्ती भर भी परवाह नहीं होती ! मनोवैज्ञानिकों के अनुसार आत्ममुग्ध लोगों का ‘रवैया अक़्सर दंभ भरा होता है, वे ख़ुद को दूसरों से बेहतर समझते हैं,अक्सर जरूरत से ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरे होते हैं, दूसरों का दुख दर्द कम ही समझ पाते हैं और शर्म और पछतावे की भावना भी उनमें बहुत कम होती है।’

आत्ममुग्धता को लोगों के व्यक्तित्व का ‘काला पहलू’ माना जाता है, यानी एक मनोविकार या मानसिक बीमारी दूसरों के दुख में देख कर ख़ुश होने की आदत (सैडिज़्म) की तरह। लेकिन एक चीज है जो ऐसे बीमार लोगों को भी आम जन की आंखों का तारा बना देती है, वह बात है एक खास किस्म की ‘मानसिक मज़बूती’ जिसके चलते वे निराशा से बहुत जल्द उबर जाते हैं !

व्यक्तियों की तरह अक्सर देश भी आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते हैं और उनकी इस आत्ममुग्धता का स्रोत होता है उनका लंबा इतिहास और मिथिहास ! हमारे यहां एक कहावत है, नालायक बेटों के बस्ते भारी; इस ‘भारीपन’ के ज़िम्मेदार कभी हम खुद होते हैं और कभी हमारी शिक्षा पद्धति जो विवेक बुद्धि को जागृत करने की बजाए तमाम तरह की जानकारी इनके ज़रिए बच्चों के दिमाग में ठूस देती है ! जैसे ब्रिटेन के स्वर्णिम इतिहास का बेताल है कि उसकी पीठ से उतरने का नाम ही नहीं लेता। उसे आज भी गर्व है कि उसने दुनिया को जीने का शऊर सिखाया, शेक्सपियर और डार्विन दिए, बेहतरीन संसदीय शासन पद्धति दी, औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात किया। दू‌सरे विश्व युद्ध में वही एक ऐसा देश था जिसने नाजियों के अश्वमेधी घोड़े को पकड़ने का साहस दिखाया था। इंग्लैंड की तरह ही अमेरिका, रूस, चीन, जापान, जर्मनी जैसे कई देश है जिनका एक लंबा और बेहतरीन इतिहास है और उन्हें उस पर नाज भी है। लेकिन उन पर चर्चा फिर कभी ! आज केवल भारत और कनाडा !

इंग्लैंड के ठीक विपरीत कनाडा की स्थिति है जो एक विकसित देश है जिसकी प्रति व्यक्ति आय दुनिया में दसवें स्थान पर हैं और मानव विकास सूचकांक के नजरिए से इसकी रैंकिंग नौवें स्थान पर है। इसकी सरकार भी पारदर्शिता, नागरिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा की गुणवत्ता और जनजीवन के अंतर्राष्ट्रीय माप में सबसे ऊंची रैंकिंग पर हैं। कनाडा में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में हैं। यहां ख़ास कर सिखों की एक बड़ीआबादी है। एक खास तरह का क्रेज़ है पंजाबी सिखों में कनाडा में जा कर बस जाने का। मेरे ही कई रिश्तेदारों के परिवार वहीं पर रहते हैं। वहां रहने वाले सिखों की अहमियत इस बात से भी लगा सकते हैं कि जस्टिन ट्रूडो की कैबिनेट में चार सिख मंत्री भी हैं यानी भारत से भी ज्यादा। शायद इसीके चलते मज़ाक में उन्हें जस्टिन सिंह ट्रूडो भी कहा जाता है ! अपने इतिहास के बोझ तले पिसते भारत की तरह कनाडा पीढ़ियों से रह रहे असमी बंगालियों को बांग्लादेशी कह कर दुत्कारता नहीं है, गले लगाता है, समान नागरिक अधिकार देता है !

सबसे बड़ी बात जो इन्हें अपने दक्षिणी पड़ोसी अमरीका से अलग करती है, वह यह है कि ये लोग अमरीकियों की तरह लंबी चौड़ी नहीं हांकते, छाती ठोस ठोक कर अपनी महानता का ढिंढोरा नहीं पीटते हालांकि ऐसा बहुत कुछ है उनके पास जिस पर वे जायज़ फख्र कर सकते हैं – बेहतरीन सार्वजनिक विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य सेवाएं और नस्लभेदी गौरांग लोगों के निज़ाम से पूरी तरह बहुसांस्कृतिक राष्ट्र बन जाने का ऐसा सुंदर सफ़र कि 15.9% वोट से 24 सीट जीतने वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी का नेता जगमीत सिंह वहां का Dy. PM भी बन सकता है ! सही अर्थों में बहुसांस्कृतिक राष्ट्र बन जाने के बावजूद भारत की तरह ही उसके भी मूलनिवासियों की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है, उसके सुंदर चेहरे पर एक काले दाग़ की तरह मौजूद है यह!

संक्षेप में, कनाडा अपने अतीत से पूरी तरह मुक्त है, उसकी पीठ पर स्वर्णिम अतीत का कोई बेताल नहीं है, चुनावी समर में उतरने वाले किसी नेता पर यह कहने का दबाव नहीं होता कि वह कनाडा को पहले जैसा महान बना देगा जबकि इंग्लैंड और भारत दोनों ही इस निर्जीव बोझ से दबे जा रहे हैं। बिना किसी लंबी चौड़ी पारिवारिक परंपरा या विरासत के व्यक्ति जितनी सहजता से जीवन जी सकता है, सफलता की नई ऊंचाइयां नाप सकता है, उतनी सहजता से परंपरा के साए में पलने आदमी नहीं कर सकता‌ क्योंकि वह हर समय इन्हें कायम रखने की फिक्र में ही परेशान रहता है ! लोक लज्जा का डर उसकी सबसे बड़ी कसौटी होती है !

ठीक ऐसा ही देशों के साथ भी होता है ! U.K. का मौजूदा प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन खुद को भले ही विंस्टन चर्चिल का अवतार समझता रहे, और भारत में मोदी भक्त जितना चाहे उसे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कह कर जय जयकार क्यों न करें, इससे दोनों के हालात में परिवर्तन तो कतई नहीं आने वाला ! भारत और यू के दोनों के सामने जो पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं, आधारभूत संरचना में बदलाव सम्बंधी जो समस्याएं हैं, उन्हें अतीत का यह मोह तो सुलझा नहीं सकता ! संसद के मुख्य द्वार पर शीश नवाकर 800 सालों की गलतियों को सही करने का वायदा कुछ समय के लिए लोगों को आपकी जय जयकार का एक अवसर भले ही प्रदान कर दे, लेकिन उसके साथ साथ सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी खत्म करने की सारी संभावनाएं भी खत्म कर देता है। बातों से भले ही आप कितनी शानदार तस्वीर खड़ी कर दें लोगों के सामने, उसे जमीन पर उतार लेना आपके बस में नहीं होता !

संघ के प्रमुख सिद्धांतकार थे गोलवरकर जिन्हें गुरु जी कहकर बुलाया जाता है। वह पूरे 35 बरस तक संघ के सरसंघचालक, माने अध्यक्ष रहे। उनकी एक बात को उनके अनुयायी वेद वाक्य की तरह स्वीकार करते है, ‘स्वर्णिम अतीत के चलते विश्व को नेतृत्व प्रदान करना हिंदुओं की नियति है।’ इतना अधिक विश्वास था उनका अपनी पुरातन परंपराओं में कि वे ‘अच्छे नागरिक’ पाने के लिए नंबूदरी ब्राह्मणों से नियोग जैसी घृणित परंपरा का भी खुले मन से समर्थन करते थे। उनका दावा था कि दुनिया को नेतृत्व प्रदान करना भारत की एक दैविक जिम्मेदारी है जिसे स्वयं विधाता ने हिंदुओं को सौंपा है। इन्हीं आदर्शों पर आधारित है मौजूदा सरकार की हिंदूराष्ट्र स्थापित करने की परिकल्पना जिसका पहला चरण सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी एक तरह से ‘आस्था का परचम’ लहरा दिए जाने के साथ ही सम्पन्न हो गया है।

आत्ममुग्धता के जो लक्षण उक्त शोध में बताए गए हैं वे लगभग सभी के सभी मौजूदा सरकार और उसके समर्थकों में कमोबेश देखे जा सकते हैं। यह दूसरी बात है कि कोई ‘नाक कट जाने’ को भी फैशन कह कर प्रचारित करने लगे ! गुरुचरण सिंह

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