Saturday, July 13, 2024
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आखिर वही हुआ जो मैने पहले ही नितिश, ममता बनर्जी और केजरीवाल के बारे में कहा था, ये तीनों अतिमहत्वाकांक्षा के शिकार हैं और मायावती अपने कारणों से कभी इंडिया के साथ नहीं आ सकती

मैने इससे पहले भी कांग्रेस के बारे में क ई बार बात कर चुका हूं लगभग एक वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस के बारे में कहा था कि एक बार जिस राज्य से कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई दोबारा सत्ता में काफी समय से नहीं आ पाई ।अधिकांश राज्यों के बारे में सही साबित हुई । उदाहरण के लिए यूपी, बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड आदि प्रदेश हैं और इसका कारण शायद यह रहा कि कांग्रेस नेतृत्व सदैव दुविधाग्रस्त रहता है न तो खुद पार्टी की मजबूती के लिए राज्यों के बारे में निर्णय ले पाता है और न तो प्रदेश नेतृत्व को मजबूत हाथों को सौंपता है और न ही किसी प्रदेश संगठन को मजबूत बनाने की दिशा में कोई स्पष्ट निर्णय ले पाता है। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुक्सान राजीव गांधी और सोनियां गांधी की अस्पष्ट निर्णयों के कारण हुई है । राजीव गांधी बार-बार यूपी में मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन करते रहे फिर बाद में सोनियांगांधी ने भी वही किया जिसके कारण धीरे-धीरे राज्य में कांग्रेस संगठन प्रदेश और जिलों में निष्क्रिय होता चला गया और सभी बडे़ नेता(जगदम्बिका पाल,नरेश अग्रवाल से लेकर हाल में आरपीएन सिंह और तमाम मुस्लिम नेताराजेशपति त्रिपाठी, जितिन प्रसाद आदि दूसरे दलों में चले गये । आज हाल यह है कि मायावती और अखिलेश जैसे नेता कांग्रेस से तालमेल कर स्वंयम तो मजबूत हो गये साथ ही कांग्रेस का मुस्लिम और दलित वोट भी अपने साथ लेते गये और।अब तो ये हाल है कि अखिलेश कांग्रेस को दो सीट देने में भी आनाकानी करते हैं वहीं सोनियां गांधी ने आंध्र प्रदेश में वाई एस आर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जगत मोहन रेड्डी के बजाय के़. रोसैया जैसे कमजोर नेता को मुख्यमंत्री बना दिया और भारी विरोध के बाद तेलंगाना राज्य बना दिया जिसका लाभ दस वर्षों तक कांग्रेस के बजाय टी आर एस के के. चंद्र् शेखर राव लाभ उठाते रहे।अगर सोनियां गांधी चाहतीं तो 2004 से 2014 के मध्य उडींसा़, तेलंगाना,यूपी और बंगाल और।यूपी में कांग्रेस को मजबूत कर सकती थीं शायद राहुल गांधी पहले ऐसे राजीव गांधी के बाद ऐसे कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही यह समझ में आ गया था कि राजनीति या हर कहीं मजबूत की ही पूछ होती है चाहें वह व्यक्ति हो या संगठन। लेकिन तब तक भाजपा बहुत मजबूत हो चुकी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू और मंदिर मुद्दा अपने पीक पर था।और राहुल गांधी को नासमझ बताने की कोशिश भी काफी समय तक काम करती रही । दूसरे क्षेत्रीय दल जो कांग्रेस के वोट के सहारे फल-फूल रहे हैं वो अपने प्रदेश में कांग्रेस को घुसने की जरा भी जगह नहीं देना चाहते उदाहरण के लिए अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और केजरी वाल हैं अब जब राहुल गांधी को यह बात समझ में आचुकी है कि खुद को मजबूत किए बिना कांग्रेस भाजपा से मुकाबिला नहीं कर सकती है राहुल गांधी ने पहले तो अपना बोझ कम किया है मल्लिकार्जुन खड़गे जैसा योग्य अध्यक्ष के सानिध्य में अब राहुल राज्यों पर ज्यादा ध्यान दे पा रहे हैं हालांकि राजस्थान , मध्यप्रदेश और छत्तीश गढ विधान सभा चुनाव कांग्रेस हारी सीटों के लिहाज से लेकिन वोट कांग्रेस को ज्यादा मिला था और इन राज्यों में अखिलेश ने जीतोड़ कांग्रेस को नुक्सान पहुंचाने का प्रयास किया किंतु उसे 0.22 प्रतिशत वोट यानि(82662 वोट) ही मिले थे और कांग्रेस को कोई नुक्सान नही पहुंचा पाये थे। कांग्रेस के लिए तेलंगाना जीत के काफी मायने है । यूपी और दिल्ली में सम्भवतः आप और अखिलेश से तालमेल हो जायेगा। नीतिश कुमार को तो पाला पलटना ही था वोफिर भाजपा के साथ हो गये हैं लेकिन इसबार बिहार में सम्भवतः नीतिश कुमार का आखिरी दौर ही होगा लगता है जनता भी इसबार नीतिश की बंदर गुलाटी से अत्यंत खफा है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे बंगाल और यूपी के साथ आंध्र, उडी़सा जैसे राज्यों में जबतक अपने को मजबूत नहीं करते हैं और क्षेत्रीय दलों का सफाया नहीं करते हैं तबतक भाजपा से उनको मुकाबला असंभव है ।हालांकि इसबार कांग्रेस नीत इंडिया और भाजपा नीत NDA के बीच लोकसभा चुनाव है लेकिन अब नीतिश कुमार भाजपा के साथ हो चुके हैं और सम्भवतः ममता के अकेले लड़ने की सम्भावना के बीच पंजाब में भी कांग्रेस को अकेले लड़ना पड़ सकता है तो कांग्रेस गठबंधन जो राममंदिर के निर्माण के बाद पहले से ही राजनितिक पंडितों के हिसाब से कमजोर था अब और कमजोर हो जाएगा, मेरे हिसाब से कांग्रेस और राजद के हिसाब से अच्छा होगा। क्योंकि ममता से लड़कर भी कांग्रेस दो सीट मिली थी और वैसे भी दो सीट से ज्यादा ममता कांग्रेस को देने को तैयार नहीं है सभी सीटों पर लड़ना कांग्रेस और भाजपा के लिए फायदेमंद है लेकिन बिहार में भाजपा को लोकसभा में लाभ तो नीतीश को कुछ नुक्सान हो सकता है लेकिन विधान सभा चुनाव में राजद गठबंधन फायदे में होगा, तय है। सम्पादकीय- News51.in

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