Saturday, April 20, 2024
होमइतिहासआओ अम्बेडकर से प्यार करें- प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा

आओ अम्बेडकर से प्यार करें- प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा

आओ अम्बेडकर से प्यार करे –
———————-प्रो लाल बहादुर वर्मा

आदरणीय बाबू जी प्रोफ़ेसर लालबहादुर वर्मा जी का ” आओ अम्बेडकर से प्यार करे ” अम्बेडकर को पहले भी पढ़ा था पर यह लेख अम्बेडकर को और नजदीक से जानने का अवसर देता है | आज उसी लेख को आपको साझा कर रहा हूँ ——

हम किसे याद करते है ?
जिससे प्यार करते है |
हम किससे प्यार करते है ?
जिससे अपनापन लगता है |
हम सबसे अधिक किससे प्यार करते है ?
अपनी माँ से !
क्यो क्योकि उसने हमे जन्म दिया है , वह न होती तो हम भी न होते | कुछ लोग धरती को , प्रकृति को भी माँ कहते है | ठीक ही है धरती , प्रकृति और देश भी माँ जैसी ही होती है | हम ही नही , हमारी माँ भी उन्ही के कारण है | इस तरह तो क्या कुछ विचार माँ जैसे नही होते ? क्या डाक्टर अम्बेडकर के विचार न होते तो इस देश के दलित वैसे ही होते जैसे आज है ? भले ही उनकी आर्थिक स्थिति बदली हो पर क्या उनका नया जन्म नही हुआ ? क्या उनमे आत्म – सम्मान नही पैदा हुआ ? क्या वे अपनी स्थिति के लिए भाग्य को जिम्मेदार मान अब चुप बैठने को तैयार है ? क्या उनमे आजाद होने की अपनी स्थिति सुधारने की , अपनी परिस्थितियों से अपने दुश्मनों से लड़ने की इच्छा और हिम्मत नही पैदा हो गयी है ? क्या पहले ऐसा संभव था ? नही . निश्चित ही नही पहले अधिकाश: लोग मान कर चलते थे ” करम गति टारे नही टरी | ‘ अब जो किस्मत में लिखा है वह तो होगा ही | कोई शुद्र अपनी मेहनत से कुछ कर भी लेता तो राज करने वाले लोग उसका जीना मुश्किल कर देते | जब राजा राम थे तो एक शुद्र ने ज्ञान प्राप्त कर लिया | पुरोहितो ने बताया कि उसे ज्ञान प्राप्त करने का हक नही है | उसके ज्ञान प्राप्त करने के कारण देश में अनर्थ हो रहा है और राजा राम ने उस शुद्र शम्बूक को जान से मार दिया | कौन जाने वही अपने जमाने का अम्बेडकर हो जाता | दलित ही खेती करते घर और सडक बनाते , मेहनत वाले सारे काम करते , पर वह समाज में सबसे नीचे रहते – यहाँ तक कि अछूत माने जाते | उनका कोई सम्मान नही होता था | वह दुसरो के सामने बैठ भी नही सकते | उसकी छाया से भी बचा जाता | अछूत औरतो से बलात्कार तो होता था — भला बिना छुए बलात्कार कैसे होता होगा | पर राज करने वाले इसी तरह पाखंड करते है | यह सिलसिला हजारो साल तक चलता रहा | फिर आज से डेढ़ सौ साल पहले हुए ज्योतिबाफुले | उन्होंने लिखा कि दलितों की ” गुलामीगिरी ” नही चल सकती | फिर हुए डा अम्बेडकर उन्होंने शम्बूक की ही तरह अध्ययन किया दुनिया बदल गयी थी इसीलिए उन्हें मारा नही जा सका और उन्होंने इतना पढ़ा — लिखा जितना कम ही स्वर्ण कर पाए है | उन्होंने जाति व्यवस्था को ही इस देश की मुख्य बुराई बताया और उसे उखाड़ने में जुट गये | उन्होंने दलितों को बताया कि उनकी दुर्दशा का कारण भाग्य नही इस देश की सामाजिक व्यवस्था है | उन्होंने दलितों को एक नई पहचान और एक तरह का नवजीवन दिया | वह पुरे दलित समुदाय की सुयोग्य और जिम्मेदार माँ जैसे थे | फिर तो उनके प्रति प्यार उमड़ना चाहिए | पर देखा क्या जा रहा है ? उनसे प्यार करने की जगह उनकी पूजा की जा रही है | — जहा भी सम्भव हो उनकी जैसी मूर्ति एक मूर्ति लगा दी . उन्हें दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र के सविधान के निर्माता की तरह स्थापित कर खुद भी थोड़ा गौरवान्वित हो लिया और 14 अप्रैल को उनकी मूर्ति पर फूल चढा दिया | क्या यह काफी है ? असल में जिसकी हम पूजा करते है उसे अपने से बहुत बड़ा मानते है | मान कर चलते है कि हम तो उस जैसे बन नही सकते | जब कि जिससे हम प्यार करते है वह हम जैसा ही होता है | हम भी उस जैसा कर सकते है | पूजा हमे निर्भर बनाती है जबकि प्यार जिम्मेदार और आत्मनिर्भर बनता है |
आइये एक नजर डाले ——————————–
डा अम्बेडकर के जीवन पर भीम राव का जन्म महार परिवार में इंदौर के पास स्थित सैनिक छावनी ( महू ) में हुआ था वहा उनके कबीरपंथी पिता रामजी सकपाल सूबेदार थे | महार महाराष्ट्र में सबसे बड़ी अछूत जाति थी और भारत में ब्रिटिश राज न होता तो उन्हें फ़ौज में नौकरी करने और अपने बच्चो को पढ़ाने का मौक़ा नही मिलता | दलित लोग अकारण ही ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता नही प्रकट करते | उन्नीसवी सदी में महारो ने हिन्दू धर्म के अंतर्गत रहते हुए भी अपने उत्थान के लिए कई प्रयास किये थे | कबीरपंथी स्वीकारना भी एक ऐसा ही प्रयास था | पर महारो के प्रति सवर्णों का नजरिया नही बदल रहा था | बालक भीम राव को प्रतिभा के वावजूद बार – बार अपमानित होना पड़ता था बहरहाल वह विख्यात अलफ़िर्सटन कालेज से स्नातक होने के बाद बडौदा के शासक की सहायता से अमेरिका और इंग्लैण्ड से कानून की सर्वोच्चडिग्रिया प्राप्त कर सके | वह लगातार कानून , राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान और दर्शन का अध्ययन करते रहे और भारत ही नही पश्चिम के विचारको की मदद लेते हुए अपनी सुधारक भूमिका और बौद्दिक तैयारी करते रहे | 26 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने प्रतिवेदन रखा कि भारतीय समाज का सबसे बड़ा विभाजन है अछूत और गैर अछूत के बीच अछूत की समाज में गुलाम जैसी स्थिति है | पर समाज ऐसा बना दिया गया है कि शुद्र कभी शिकायत भी नही कर सकता | उन्होंने ‘ भूक नायक ” नाम से एक पत्रिका शुरू की ताकि जनता तक बाते पहुचे और वह अपनी जबान खोलने की हिम्मत जुटा पाए | कुछ दिनों बाद उन्होंने ‘ बहिष्कृत भारत ” नाम से एक पाक्षिक शुरू किया पर ये प्रयास बहुत दिनों तक नही चल पाया | वह सामाजिक नेता के रूप में महाड़ सत्याग्रह के बाद स्थापित हुए | वह ‘ पहला अछूत मुक्ति आन्दोलन ‘ कहा जा सकता है | आन्दोलन एक सार्वजनिक तालाब से पानी भरने के अछूतों के अधिकार से शुरू हुआ था | आन्दोलन असफल हो गया पर अम्बेडकर अछूतों को जगाने में सफल हो गये | मनुस्मृति वह ग्रन्थ है जिसने हिन्दू समाज को पूरी तरह बात कर दलितों और नारियो को पशु से भी नीचे का दर्जा दिया है | आज भी ब्राह्मणवाद का मानसिक आधार है | दलितों का हौसला इतना बढ़ गया कि उन्होंने मनुस्मृति को कई जगह जला कर विरोध प्रकट किया | इस बढती जागृति को उस समय देश की आजादी का नेतृत्व करने वाली पार्टी कांग्रेस ने अछूत – प्रथा के अन्त की बात तो मान ली पर इन जातियों को कोई विशेष अधिकार देने को तैयार नही हुई | भारत की आजादी को लेकर लन्दन में भारत के प्रतिनिधियों के साथ ब्रिटिश सरकार ने बैठके की | उसमे अम्बेडकर ने स्पष्ट कह दिया कि दलित वर्गो को राजनितिक कारणों से हिन्दू कहा जाता है पर उन्हें हिन्दू माना नही जाता | इसीलिए उन्हें हिन्दुओ से अलग दर्जा मिलना चाहिए | अंग्रेज सरकार ने यह बात मान ली तो गांधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया कि वह दलितों को हरिजन कहते थे पर पारम्परिक वर्णाश्रम धर्म में विश्वास बनाये हुए थे | वह तो भ्गियो को भी अपने काम को पवित्र समझकर करते जाने को कहते थे | इसलिए दलित उन पर उस तरह विश्वास नही करते थे जैसे अम्बेडकर पर | लेकिन गांधी जी इतने बड़े नेता बन गये थे कि अम्बेडकर को झुकना पडा और दलितों को हिन्दुओ से अलग करने की मांग छोडनी पड़ी | अम्बेडकर बहुत दुखी हुए इस समझौते से और लगातार सोचने लगे दलितों को हिन्दू धर्म की घुटन से बाहर आना चाहिए | उनके अनुसार मनुष्य को किसी न किसी प्रकार के धर्म की तो जरूरत है पर वह सिद्दांतो वाला धर्म होना चाहिए — कर्मकांडो वाला नही | लगातार सोचने के बाद उन्होंने बौद्द धर्म स्वीकारा और अपने लाखो अनुयायियों के साथ नागपुर में बौद्द हो गये क्योकि उन्हें बौद्द धर्म सबसे अधिक तर्क संगत और आडम्बरहीन लगा | उसी में दुःख का कारण ढूढ़ कर उसके निवारण की बात थी | दलितों को राजनितिक रूप से संगठित करने के लिए उन्होंने एक पार्टी बनाई जो एक तरह से किसान – मजूर पार्टी थी जिसका झंडा कम्यूनिस्टो के झंडे की तरह लाल था | इस इंडीपेटेड रिपब्लिक का नाम और स्वरूप बदलता गया और अनत में वह रिपब्लिकन पार्टी कह्लायियो | भारत का सम्विधान सभा में अम्बेडकर इसी उद्देश्य से शामिल हुए थे कि आजाद हिन्दुस्तान के लिए बनने वाले सविधान में दलितों के हित की रक्षा हो सके | हालाकि उन्हें सविधान की मसविदा समिति का अध्यक्ष बना दिया गया था और इसीलिए उन्हें भारत का सविधान निर्माता कहते है पर वह तो इस सविधान से सबसे असंतुष्ट थे और यहाँ तक कह दिया था कि अगर इसे जल्दी ही बदला नही गया तो वह निर्थक हो जाएगा | भारत को गांधी ग्राम प्रधान देश कहते थे | कवि लोग गाते थे भारत माता ग्रामवासिनी | पर अम्बेडकर ने देखा कि गाँव में ही सामाजिक गैर बराबरी और जकड़ सबसे अधिक मजबूत है गाँव से दलित रोज – रोज अपमानित होता है | इसीलिए उन्होंने दलितों को गाँव छोड़ देने का आह्ववान किया | शहरों में मलिन बस्तियों में रोज – रोज अनगिनत कठिनाइया झेलते हुए भी दलित अपने गाँव को गाँव की अपेक्षा कं अपमानित महसूस करते है

बहरहाल अम्बेडकर की वास्तविक उपलब्धी भारत का सविधान नही दलितों में पैदा हुआ आत्मसम्मान है | उन्होंने ‘ शुद्र कौन थे ‘ लिखकर जाति – व्यवस्था की पोल खोल दी और ‘ जाति व्यवस्था का अंत ‘ लिखकर स्पष्ट कर दिया कि जाति व्यवस्था अंत हुए बिना न केवल दलितों का बल्कि सारे भारतीय समाज का कल्याण नही हो सकता | इस देश में सबसे पिछड़ा समझे जाने वाले दलितों ने सबसे पहले सारे मानव समाज को सामने रखा था | ज्योतिबाफुले ने दलितों की गुलामगिरी के विरुद्द जब आवाज उठाई थी तो उन्होंने दूर – दराज अमरीका के काले लोगो के नस्लवाद विरोधी संघर्ष से अपने को जोड़ा था | उनके लिए अमरीका के अफ़्रीकी मूल के काले लोगो का श्वेत शासको के विरुद्द संघर्ष वैसा ही था जैसा भारत में दलित लोगो को ब्राह्मणवाद के विरुद्द संघर्ष | वास्तव में दुनिया में दो ही तरह के लोग है — एक वे जो अपना कमाई से किसी तरह जी पाते है और दुसरे वे जो दुसरो की कमाई पर गुलछरे उड़ाते है | बीच में एक भारी माध्यम वर्ग है जो उपर वालो की तरह बनने के लिए उन्ही के हथकंडे अपनाता है और दलितों के विरुद्द खड़ा होने में तनिक नही हिचकता | उन्हें भी अम्बेडकर से मुक्ति सन्देश मिल सकता है | अम्बेडकर ने उसी तरह समस्या का विश्लेष्ण किया था जैसे मार्क्स ने पूंजी का | दोनों का उद्देश्य था कि दुनिया बदले और मेहनत करने वालो को उनका हक मिले और वे सारे आनन्द पा सके जो इस दुनिया में ही मिल सकता है और जिनकी मेहनतकरने वाले लोग ही नीव रखते है | दोनों , सबसे दुखी और अपमानित लोगो की विशेष रूप से बात करते थे पर उनका मतलब यह था कि यह पूरी दुनिया बदले अनुयायियों की सोच छोटी होती गयी और नतीजा यह निकला कि सभी बड़ी – बड़ी बाते करते हुए छोटे – छोटे तात्कालिक लोभो के चक्कर में फंसते गये |

अम्बेडकर से प्यार करने का मतलब
1- अपने को किसी से कम न समझना |
2 – अपने को ही नही दूसरो को भी — औरतो और बच्चो को भी , सबके बराबर समझना |
3 – न अत्याचार सहना , न अत्याचार करना – न घर में न बाहर |
4 – अपने को लगातार पहले से अच्छा बनाते जाने की कोशिश करना | जैसा कि अम्बेडकर ने किया था
5- यह मान कर चलना कि मिल – जुल कर रहने और मिल – जुल कर संघर्ष करने से ही दुनिया बदलेगी
6- जैसे जीने की लड़ाई रोज – रोज लडनी पड़ती है वैसे ही अपनी जिन्दगी और दुनिया को बदलने की भी लड़ाई रोज – रोज लड़नी पड़ेगी
7- जो अम्बेडकर कर सकते थे हम भी कर सकते है — जरूरत पड़ने पर उनसे आगे भी जा सकते है |

प्रस्तुती – सुनील दत्ता ——- स्वतंत्र पत्रकार व दस्तावेजी प्रेस छायाकार

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments