Monday, April 22, 2024
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अतीत के झरोखों से आजमगढ -आतता ई नाजिम फजल अली

अतीत के झरोखो में आजमगढ़

आततायी नाजिम फजल अली

निजामाबाद में मोअज्जम जहाँ खा हत्याकांड की बड़ी चर्चा रही | अवध का नवाब बहुत व्यथित था | वसूली हुई नही , उल्टे दो हत्याए हो गयी थी | घटना की जाँच के लिए उसने अपने (वजीर बन्दोबस्त) जनाब बेनी बहादुर को जाँच व व्यवस्था हेतु आजमगढ़ भेजा | अब तक की परिस्थिति के मद्दे नजर अवध – शासन को विशवास हो गया था कि गौतम राजवंश अदायगी नही कर पायेगा | अजमतशाह के जमाने से लेकर जहाँखा के समय तक खिराज खामी की हालत थी आजम खा विरक्त होकर जौनपुर में थे , किला खाली था | जाँच करके बेनी बहादुर इलाहाबाद चले गये वहाँ अन्य अधिकारियों से राय मशविरा करके वसूली का ठेका गाजीपुर के निवासी फौजदार नाजिम फजल अली को सौपं दिया गया जो अत्यंत खूँखार

क्रूर और देसी तैमुरलंग के रूप में विख्यात था कदाचित गजेटियर या अन्य किसी स्रोत से हरिलाल शाह ने इसे बहुत सीधा – साधा आदमी बताया है लेकिन यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि दयाशंकर मिश्र के इतिहास की प्रमाणिकता पर स्व परमेश्वरी लाल गुप्त ने जांचा था और माना था कि फजल अली नृशंस व्यक्ति था | मिश्र जी बताते थे कि रिकार्ड रूम में कई प्राचीन मुकदमो की पत्रवाली में उल्लेख्य था कि जायदाद नाजिम फजल अली के वक्त नादिह्न्दाई से कब्जा कर दूसरो के नाम हो गयी और उत्पन्न बलवे मालिके जायदाद का खून हो गया …
रही बात गजेटियरो की तो ये जितना बोलते है उससे ज्यादा झूठ बोलते है
अपनी चर्चित विशेषताओं के चलते फजल अली ने भीषण उत्पात मचा रखा था हाथ पैर बाँधकर मुर्गा बनाकर कोड़े से पिटवाना घर में आग लगवा देना घर की औरतो को सबके सामने नगा कर बेइज्जत करना उसकी वसूली प्रक्रिया में सामान्य अंग थी | लोगो ने जमीन – जायदाद बेचकर मालगुजारी चुकी और कामचोर लोगो ने उसे बर्दाश्त कर लिया लेकिन ठाकुरों और भूमिहारो की जमींदारी मजबूत थी | उनके पास लठैतो की फ़ौज थी सो उन लोगो ने उससे पंगा लिया लेकिन नाजिम पर अवध शासन का वरदहस्त था
इसलिए उसका अत्याचार भारी पड़ जाता इससे बड़े जमींदार काश्तकार बहुत व्यथित और अपमानित हुए | वे बार बार गौतम राजवंश की तरफ निहारते जिसके उत्तराधिकारी आजम खा जौनपुर में रह रहे थे | अजमत शाह और महावत खा के समय राजगुरु के पद पर प्रतिष्ठित पंडित बलदेव मिश्र के वंशजो को जौनपुर में सबरहद के पास जमीन मिली थी , उन्ही के भतीजे पंडित हरजू मिश्र उस समय जौनपुर में ही रहते थे | और समय समय पर अपने गुरुटोला मुहल्ले के गुरुघाट में आते – जाते रहते थे |उन्होंने फजल अली की नृशंसता को अपनी आँखों से देखा था
वे जौनपुर में आजम खा से मिले उनकी सारी बातो से अवगत कराया | हरजू मिश्र के संगत में आजम खा संस्कृत और ब्रजभाषा का गहरा आस्वादन किये | हरजू मिश्र ने उन्हें राज की बिगड़ी दशा पर प्रेरित किया और गौतम राजवंश की टूटी कड़ी को जोड़ने की भी प्रबल प्रार्थना किया | इसे और बल देने के लिए वे आजमगढ़ आये और यहाँ के ठाकुरों व्यवसायियों तथा आम जनता की पंचायत की फिर चुने हुए लोगो को लेकर वे जौनपुर आये और आजम खा से मुलाकात करवाई | आजम खा राजी हो गये फिर पूरा दल इलाहाबाद गया और बेनी बहादुर से आपत्ति जताई वजीरे बदोबस्त ने पहले भी नाजिम की नृशंसता की खबरे सुन रखी थी वह गलत हिसाब भी देता उन्होंने शुजाउद्दौला से भी मुलाक़ात की आजम खा ने छ: महीने का खिराज अग्रिम देने का भी वादा किया वही नवाब ने नाजिम फजल अली का ठेका भंग कर दिया |
किले से पश्चिमी इलाके में जब नाजिम के कारिंदे अपना दमन चक्र अमानवीय ढंग से चला रहे थे तभी आजम खा और ठाकुरों के दल ने उन्हें रोका और ठेका की समाप्ति की सूचना दी इस पर पहले तो कारिंदे बिगड़े लेकिन जनता से बुरी तरह घिरा देखकर रुक गये | एक विश्वस्त सरदार गाजीपुर और दूसरा इलाहाबाद भेजा गया | नाजिम तो दूसरे दिन आ गया और गालियों के साथ नवाब को धमकी देता रहा | आजम खा ने उसे सख्ती से रोका और आदेश दिखाया | नाजिम भीषण क्रोध में आ गया लेकिन आजम खा के पौरुष और चारो तरफ लठैत जनता से घिरा देख लड़ाई पर नही उतरा
जब इलाहाबाद से लौटकर सरदार ने आदेश की पुष्टि कर दी तो नाजिम ने कारिंदों को गाजीपुर लौट जाने का हुक्म दिया जाते जाते उसने आजम खा से बदला लेने की कसम खायी
मिश्र जी कहते थे कि वह देवित्थान एकादशी का भिनुसार था , गाँव की स्त्रिया पुराने फटे सूप को डंडे से पिट – पिट कर इस्सर पइठे दलिद्दर निकसै कह रही थी — इसे नाजिम फजल अली ने अपना भीषण अपमान समझा जहाँ से नाजिम का जमावड़ा उखडा था उस स्थान को आजमपुर नाम दिया गया | दूसरे दिन आजम खा को जनता ने किले में बैठकर सत्कार अभिनन्दन सहित राजगद्दी दी और उन्हें आजम खा से आजमशाह द्दितीय का नाम दिया गया | नवाब से अनुमोदन प्राप्त कर आजम शाह 31 जनवरी 1765 को गद्दी नशींन घोषित किये गये हरजू मिश्र उनके राजगुरु के पद पर बिठाये गये | बहुत दिन बाद एक बार पुन: गौतम राजवंश के प्रतिष्ठित होने से जनता में अपार हर्ष और उत्साह आ गया |

प्रस्तुती सुनील दत्ता – स्वतंत्र पत्रकार – समीक्षक
सन्दर्भ – आजमगढ़ का इतिहास – राम प्रकाश शुक्ल निर्मोही
विस्मृत – पन्नो पर आजमगढ़ — हरिलाल शाह

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