Sunday, May 26, 2024
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अक्टूबर में मिल जाएगा कांग्रेस को नया अध्यक्ष, जो होगा नेहरू गांधी परिवार का खास

कल सीडब्लूसी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की प्रक्रिया की तारीखों का एलान हो गया, इसके साथ ही यह कयास लगाने वालों के मुंह भी बंद हो गए जो कहते थे कि चुनाव फिर टलेंगे। राहुल गांधी ने अपने स्वयंम और प्रियंका गांधी के भी अध्यक्ष न बनने की घोषणा पहले ही कर दी थी और सभी राहुल गांधी के जिद्दी स्वभाव से परिचित हैं इसलिए इतना तो तय है कि भले ही लोग अभी भी राहुल गांधी पर अध्यक्ष बनने का दबाव डाला जा रहा है लेकिन वे लोग भी जान चुके हैं कि वह और प्रियंका गांधी अध्यक्ष नहीं बनने जा रहे हैं अर्थात अब कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है। ये भी सच है कि बिना नेहरू गांधी परिवार के आशीर्वाद के कोई कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बन पाएगा। लेकिन मात्र इससे काम नहीं चलने वाला है अध्यक्ष बनने वाला नेता संगठन की कला में माहिर और सभी प्रदेश में जाति, धर्म, सम्प्रदाय के बारे में विस्तृत जानकारी रखता हो। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हर फन मौला होने के साथ ही भाषण देने की कला में माहिर, परिश्रमी और हर समय चुनावी मूड में रहता है तो अगर भाजपा से मजबूती से टक्कर लेना है तो कांग्रेस को भी ऐसे ही हरफनमौला अध्यक्ष का चुनाव करना होगा अन्यथा इस कवायद का कोई मतलब नहीं रह जाता, और सिर्फ नेहरू गांधी परिवार का कृपा पात्र होना ही आवश्यक नहीं बल्कि हर क्षेत्र की गहरी जानकारी के साथ ही हर समय चुनावी मूड में रहने वाला नेतृत्व ही कांग्रेस में नयी जान ला सकता है, वैसे लोगों और सूत्रों के मुताबिक दक्षिण भारत के मल्लिकार्जुन खडगे, हरियाणा की दलित नेत्री शैलजा, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत और सचिन पाइलेट, छत्तीस गढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, बिहार की दलित नेत्री मीरा कुमार गांधी नेहरु परिवार की पसंदीदा नेता और उनके खास हैं इन्ही में से किसी एक को अध्यक्ष बनाना सोनियां गांधी चाह भी रही हैं। भाजपा भले ही नेहरू गांधी परिवार पर यह आरोप लगाती हो कि यही परिवार क्यों कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाता है इसी कारण राहुल गांधी ने अपने और प्रियंका को अध्यक्ष बनने से इनकार कर इस आरोप को भोथरा करने का कार्य किया है लेकिन यह भी सच्चाई है कि जब विपक्ष के सारे नेता इडी और सीबीआई के डर से मुह बंद किये हैं और भाजपा के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते तब अकेले राहुल गांधी ने डंटकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी और विरोध दर्ज कराया, लेकिन यह भी सच है कि उन्हें लड़ने के तरीके नहीं मालूम। सेनापति स्वयं लड़ाई नहीं लड़ता, यह हर छोटी बड़ी घटना में स्वयंम ही पहुंच जाते हैं। पहले प्रदेश नेतृत्व लड़ता है और प्रदेश के अन्य बड़े नेताओं के साथ कार्यकर्ता लड़ता है, प्रेस कांफ़्रेंस भी स्वयंम करने लगते हैं देरी से डिसीजन लेना और जिद उनकी कमजोरी है जिसके कारण वह मेहनत से लड़ाई लड़ने के बाद भी बहुत सफल नहीं हो पा रहे थे। अब उपर जिन सम्भावित अध्यक्षों का उपर जिक्र किया गया है उनकी खूबियों और कमजोरियों का भी जायजा लेना आवश्यक है। मल्लिकार्जुन खडगे गांधी नेहरु परिवार के विश्वास पात्र अवश्य हैं लेकिन हिंदी ठीक से नहीं बोल पाते और उनकी उम्र भी भागदौड़ के योग्य नहीं है और हिंदी भाषी क्षेत्रों में उनको कोई झान नहीं है, दूसरे कुमारी शैलजा हरियाणा की हैं और वो भी गांधी नेहरु परिवार की विश्वास पात्र होने के साथ दलित समुदाय से आती हैं लेकिन उनपर भी कांग्रेस नेतृत्व का भार दिया जाना क ई कारण से सम्भव नहीं है। सचिन पायलट एक बार कांग्रेस से विद्रोह कर चुके हैं अन्यथा वह हर कसौटी पर खरे उतर सकते थे बाकी बची मीरा कुमार, जो दलित समुदाय की हैं किंतु बेहद सज्जन और विनम्र हैं स्वयंम बिहार के दलित भी उन्हें अपना नेता नहीं मानते। छत्तीस गढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत में अशोक गहलौत क ई कारणों से भूपेश बघेल से बीस पड़ते हैं और संगठन क्षमता में उनका कोई तोड़ नहीं है और उन्हें हिंदी भाषी क्षेत्रों की तो बहुत जानकारी है ही, उन्हें सम्पूर्ण भारत की सारी जानकारी है साथ ही सारे नेताओं (चाहे कांग्रेस का हो या अन्य दलों के नेताओं की,खूबियां और कमजोरियों की जानकारी रखते हैं और राजस्थान में चार बार मुख्य मंत्री रहे हैं और भाजपा ने जब सचिन पायलट के माध्यम से कांग्रेस तोड़ने का प्रयास किया था तब उसके मंसूबे को भी ध्वस्त उन्होने अपने कौशल और सजगता से किया था और भी बहुत सारी खूबीयां उनके अंदर हैं साथ ही गांधी नेहरु परिवार के सबसे भरोसेमंद नेता हैं और गांधी विचार धारा के नेता हैं, बेहद इमानदार हैं और उन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप कोई नहीं लगा सका। बघेल वैसे भी छत्तीस गढ छोड़ कर जाने के इच्छुक नहीं लगते ।ऐसे में शायद अशोक गहलौत के रूप में अक्टूबर माह में हमें कांग्रेस अध्यक्ष देखने को मिल जाए। अब थोड़ी सी जी- 23 के नेताओं की बात करते हैं। उनमें गुलाम नबी आजाद पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। कपिल सिब्बल सपा के समर्थन से राज्य सभा जा चुके हैं और भूपेंदर सिंह हुड्डा के कहे मुताबिक दलित अध्यक्ष बनाकर पूरी हरियाणा की बागडोर भूपेंदर सिंह हुड्डा को सौंपी जा चुकी है, जो वास्तव में इसके योग्य थे भी। हरियाणा में कांग्रेस के पास उनसे बेहतर कोई विकल्प भी नहीं था। बचे मनीष तिवारी और आनन्द शर्मा। इन दोनों का क्षेत्र बहुत सीमित है बाकी सभी शोपीस नेता जी- 23 के थे। सम्पादकीय -News 51.in

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